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अमीर खुुसरो 715वां उर्स : प्रेम और इबादत से मिलेंगे खुदा

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अमीर खुुसरो के 715वें उर्स (20-24 जून) पर विशेष

कव्वाली का आविष्कार अमीर खुसरो ने किया था। हिन्दू लोक जीवन में जिस प्रकार भजन, कीर्तन, कजली, चैती, देवी, लांगुरिया आदि का चलन है, वैसे ही कव्वाली मुस्लिम सूफी परम्परा की विशेष आध्यात्मिक गायिकी है। यह सूफी परम्परा में खुदा की इबादत है। जैसे हिन्दू ईश्वर की पूजा या आराधना के लिए भजन, कीर्तन व आरती करते हैं, वैसे ही कव्वाली सूफियों का भजन-कीर्तन है। सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती ने यहीं भारत में बसने के बाद हिन्दुओं का भजन-कीर्तन देख कर ही कुरान की आयतें डफ पर गाने का रिवाज शुरू किया। यह महफिले समां या सिमां के नाम से मशहूर हुआ। कव्वाली में ईश्वर और गुरु की वंदना की जाती है।

सूफी संत, गुरु और संगीत को ईश्वर को पाने का सबसे सशक्त माध्यम मानते हैं। पहले कव्वाली सिर्फ डफ पर होती थी, फिर अमीर खुुसरो द्वारा यह ढोलक पर होने लगी। जब हजरत अमीर खुुसरो ने सितार ईजाद किया, तो सितार पर कव्वाली होने लगी। कभी-कभी कव्वाली के साथ खुुसरो सितार और रबाब भी बजाते थे। खुसरो का कथन है, ‘जब तक इनसान सांसारिक प्रेम को सही तरीके से नहीं जान पाता, तब तक उसके लिए आदर्श ईश्वरीय प्रेम तक पहुंचना संभव नहीं, उसे पाना तो फिर दूर की बात है। एकमात्र प्रेम ही ऐसा है, इबादत ही ऐसी है, जो तुम्हारे अहंकार को समाप्त कर तुम्हें ईश्वर से मिलाएगी। अपने भीतर का अहंकार खत्म किए बिना ना तो सांसारिक प्रेमी को पाया जा सकता है, ना रूहानी प्रेमी ईश्वर को। 

कव्वाली परमात्मा से बंदे का संबंध जोड़ती है। सारी जिंदगी सूफी ईश्वर रूपी प्रेमी को पाने की लालसा में ‘कव्वाली’ सुनते व गाते हैं। किसी सूफी के स्वर्गवास के वक्त भी इसी लालसा में उसके जनाजे के साथ कव्वाली गाई जाती है। इसके बाद सूफी संतों के मृत्यु दिवस को ‘उर्स’ के नाम से मनाया जाता है। उर्स बिना कव्वाली के पूरा नहीं हो सकता। उर्स का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ही कव्वाली गा-गा कर उस परमात्मा को याद कर, गुजर चुके सूफी संत के लिए दुआ करना है कि वह परलोक में अपने जीवन के असल प्रेमी परमात्मा के साथ खुश रहे।

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