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26 फरवरी, 2020|12:59|IST

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पितरों की तिथि कहलाती है अमावस्या, जरूर करें अन्न का दान

पूर्णिमा और अमावस्या दोनों का ही विशेष महत्व माना जाता है। पूर्णिमा की रात के पश्चात चंद्रमा घटते-घटते अमावस्या तिथि को पूरा लुप्त हो जाता है। अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव माने जाते हैं। इसलिए श्राद्ध कर्म या पितर शांति के लिए यह तिथि अनुकूल मानी जाती है। यह तिथि पितरों की तिथि कहलाती है।

अमावस्या पर घर में साफ सफाई करें और गंगाजल छिड़कें। इस दिन पीपल का पूजन करना उत्तम होता है। भगवान विष्णु के मंदिर में ध्वज लगाएं। इस दिन सुबह-शाम घर के मंदिर और तुलसी पर दीया जलाएं। अमावस्या पर तुलसी के पत्ते या बिल्व पत्र नहीं तोड़ना चाहिए। अमावस्या पर कोई नया कार्य, यात्रा, क्रय-विक्रय निषेध माना जाता है। अमावस्या पर क्रोध न करें। ध्यान रखें कि घर में क्लेश न हो। इस दिन पितरों को याद करें। दान करें। अमावस्या को संयम, साधना और तप के लिए श्रेष्ठ दिन माना जाता है। इस दिन आटे की गोलियां बनाकर तालाब में मछलियों को खिलाएं। हनुमान जी का पाठ कर लड्डू का भोग लगाएं। इस दिन अन्न का दान अवश्य करें। शनिदेव के लिए तेल का दान करें। इस दिन गंगास्नान का विशेष महत्व है। घर में हवन कराएं। भगवान शिव की पूजा करें। किसी के बारे में बुरा न सोचें।

इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।