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7 मई, 2021|12:30|IST

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अलोपशंकरी मंदिर : इस मंदिर में झूले को देवी का दर्जा दिया जाता है, देवी सती की गिरी थीं उंगलियां

धर्म और आस्था की नगरी प्रयागराज में शक्तिपीठ अलोपशंकरी देवी का प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर अपनी विशिष्टता और पौराणिक मान्यता के लिए प्रसिद्ध है। सभी 51 शक्तिपीठों में से यही एक ऐसा शक्तिपीठ है, जहां देवी निराकार रूप में मौजूद हैं। एक झूले को देवी स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है।
अलोपशंकरी मंदिर में न तो मां की कोई मूर्ति है, न ही किसी अंग का मूर्त रूप है। इसलिए इसका नाम अलोपशंकरी पड़ा। मंदिर के गर्भगृह में एक चबूतरा बना है, जिसके बीच में जल से भरे कुंड के ऊपर एक झूला लटकता रहता है। लाल चुनरी में लिपटे उसी पालने को देवी स्वरूप मानकर पूजन-अर्चना की जाती है। आस्था के इस अनूठे मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन-पूजन के लिए आते हैं। वे कुंड से जल लेकर पालने पर चढ़ाते हैं। साथ ही पालने की परिक्रमा कर देवी से आशीर्वाद लेते हैं।

देवी सती की गिरी थीं उंगलियां
-मंदिर के महंत जमुना गिरि ने बताया कि देवी सती की उंगलियां इसी स्थान पर गिरी थीं। जिस स्थान पर देवी की उंगली गिरी, वहां एक बाग था। बाग में स्थित कुंड में उंगली गिरने के बाद वह लुप्त हो गई थी। सती के अंग के लुप्त होने के बाद ही शिव को बोध हुआ की देवी जा चुकी हैं और वह शांत होकर समाधि में लीन हो गए।

दान-पुण्य का नहीं होता लोप
-अलोपशंकरी स्त्रोत के मुताबिक शक्तिपीठ अलोपशंकरी में किए गए पूजा-पाठ, तप, दान आदि से अर्जित पुण्य कर्मों के फल का कभी लोप नहीं होता। इसलिए देवी को अलोपशंकरी के साथ अलोपी देवी के नाम से भी जाना जाता है। यह भी मान्यता है कि मंदिर में पैर या हाथ में रक्षा सूत्र बांधकर मांगी जाने वाली हर मन्नत जरूर पूरी होती है।

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  • Web Title:Alopashankari Temple: In this temple the swing is given the status of a goddess the fingers of the goddess Sati fell