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मन की समता: अध्यात्म की पहली सीढ़ी

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ओंकार स्वरूप परब्रह्म परमात्मा, जो जगत में और मेरे भीतर भी व्याप्त है, उसके साथ जुड़ने के लिए आवश्यकता है इस मन रूपी दीवार को पार करने की। जब तक अपने और परमात्मा के मध्य में यह मन रूपी दीवार है, तब तक मनुष्य न अपने आपकी पहचान कर सकता है और न ही परमात्मा की पहचान *कर सकता है। साधना भी तब तक संभव *नहीं है।.

साधक होने के लिए जिन गुणों की जरूरत है, उन गुणों को आपको अर्जित करना होगा। साधक की सबसे पहली आवश्यकता, सबसे पहली जरूरत और सबसे पहला गुण क्या है, जिसके बगैर कोई भी मनुष्य साधक नहीं हो सकता? वह गुण है मन की समता। मन का समभाव में रहना। अगर मन समभाव में नहीं है, बिखरा हुआ है, अनेक विषयों का चिंतन कर रहा है, मन में अनेक प्रकार के विचार चल रहे हैं, अनेक प्रकार की आसक्तियां भरी पड़ी हैं, तो ऐसे अंधकारपूर्ण मन के साथ साधना संभव नहीं है। मन की समता उसे कहते हैं, जिसमें आपका मन किसी भी प्रकार के द्वंद्व में नहीं रहता। प्राय: लोगों का मन सिर्फ द्वंद्व में ही जीता है। मित्र-शत्रु, अपना-पराया, अच्छा-बुरा, सज्जन-दुष्ट। यह मन का स्वभाव ही है कि बात को कभी वह संयुक्त रूप से नहीं देखता, टुकड़ों में बांट कर देखता है। मन की आदत है कि वह हर बात का विश्लेषण करता रहता है। खुद भी टुकड़ों में बंटा पड़ा है और जिसके बारे में सोचता है, उसको भी टुकड़ों में बांट देता है। किसी भी व्यक्ति के बारे में बात करते हुए तुम कहते हो, ‘उसमें यह बात अच्छी है और यह बात बुरी है।' किसी इमारत को देखते हो, तो कहते हो, ‘इसमें यह बात अच्छी है और यह बात अच्छी नहीं है।' कोई कपड़ा लेने जाते हो तो कहते हो,‘यह रंग अच्छा है, लेकिन इसकी बनावट ठीक नहीं है।'.

तुम्हारा मन हर चीज को तोड़ता रहता है। मन के इसी स्वभाव के कारण तुम लोग जब ध्यान में बैठते हो, तब भी तुम्हारा मन टुकड़ों में बंटा रहता है। तुम्हारा मन किसी भी विषय में पूरी तरह एक होकर रहता ही नहीं। लेकिन जिस परमात्मा का ध्यान करते हो, वह द्वंद्वातीत है। यानी परमात्मा हर प्रकार के द्वंद्व का साक्षी मात्र है, वह हर प्रकार के द्वंद्व से परे है। जब तक तुम मन में जी रहे हो, तब तक तुम परमात्मा से दूर ही रहोगे, क्योंकि मन का स्वभाव ही है द्वंद्व में रहना।.

मन के इस द्वंद्व से बाहर आ जाने को कहते हैं- मन का सम हो जाना। तब हमारा मन चीजों को तोड़ कर नहीं देखता। वस्तुओं और व्यक्तियों के बारे में एकतरफा निर्णय लेने की गलती नहीं करता। जो जैसा है, सो वैसा है और जो जैसा नहीं है, सो वैसा नहीं है- इस तथ्य को मन स्वीकार कर लेता है। अगर कोई अच्छा है, तो उसको उसकी अच्छाई मुबारक और अगर कोई बुरा है, तो उसको उसकी बुराई मुबारक। उसकी अच्छाई या बुराई के बारे में सोच कर हम अपने कीमती समय को क्यों बर्बाद करें? लेकिन तुम हमेशा समय की बर्बादी करते रहते हो। हमेशा दूसरों के बारे में सोचते-सोचते तुम यह बात भूल ही जाते हो कि ‘हमें कभी रुक कर अपने बारे में भी सोचना चाहिए, अपने मन की स्थितियों के बारे में भी सोचना चाहिए।' एक साधक को सबसे पहला काम यही करना चाहिए कि वह दूसरों के बारे में सोचना छोड़ ही दे। जब तक इस आदत से तुम बाहर नहीं आओगे, तब तक अध्यात्म की ऊंचाइयों को तुम छू नहीं सकोगे। .

‘नांगे आवण नांगे जाणा, कोई न रहसों राजे राणा।'.

इस वैराग्य-वृत्ति के साथ जो नहीं रहेगा, उसका मन समता में कैसे आ पाएगा! जिसका मन समता में नहीं आया, वह साधक ही नहीं है। मन की समता बहुत जरूरी है। इस मन की समता को प्राप्त करने के दो साधन हैं- एक है चिंतन और दूसरा है ध्यान।.

मेरे किए गए चिंतन को शब्दों में सुन भर लेने से आपका चिंतन नहीं हो जाएगा। जो मैं इस समय कह रही हूं, यह मेरी अपनी सोच का निष्कर्ष है। लेकिन मेरे चिंतन को, मेरी सोच के निष्कर्ष को सुनकर या पढ़ कर आप कैसे ज्ञानी हो जाओगे? दूसरे की अमीरी को देख भर लेने से कोई खुद अमीर नहीं हो जाता। इसीलिए याद रहे, इस साधना के मार्ग पर हर व्यक्ति को अपनी कमाई खुद करनी पड़ती है। वह अगर एक पैसे जितनी मेहनत करता है, तो वह एक पैसे जितनी ही प्राप्ति कर लेता है, और अगर वह दस रुपये जितनी मेहनत करता है, वह दस रुपये जितनी प्राप्ति कर लेता है।.

जागरूक रह कर, चेतन रह कर, सजग होकर जितनी साधना आप करते जाते हो, उतनी ही आपकी आध्यात्मिक उपलब्धि बढ़ती जाती है। आपको उपलब्धि तभी हो पाएगी, जब आप ख़ुद मनन करने लग जाओ।.

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