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Hindi News Astrology2nd Pradosh Vrat June 2024 date shubh muhurat and poojavidhi

ज्येष्ठ माह का दूसरा प्रदोष व्रत कब है? जाने सही डेट, शुभ मुहूर्त, पूजाविधि

Pradosh Vrat 2024 Date, Shubh Muhurat : दृक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह का दूसरा प्रदोष व्रत 19 जून को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शिव-गौरी के पूजन से सभी कष्ट दूर होते हैं।

ज्येष्ठ माह का दूसरा प्रदोष व्रत कब है? जाने सही डेट, शुभ मुहूर्त, पूजाविधि
Arti Tripathiलाइव हिन्दुस्तान,नई दिल्लीTue, 11 Jun 2024 04:04 PM
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Pradosh Vrat June 2024 : हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत के दिन शिवजी और मां पार्वती की पूजा-आराधना का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि प्रदोष व्रत के दिन भोलेनाथ की पूजा करने से साधकों को विशेष फलों की प्राप्ति होती है। महादेव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं और सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है। हर माह में शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। दृक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह का दूसरा प्रदोष व्रत 20 जून को रखा जाएगा। आइए जानते हैं इस प्रदोष व्रत का सही डेट, शुभ मुहूर्त,पूजाविधि और व्रत नियम

कब है ज्येष्ठ माह का दूसरा प्रदोष : दृक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि का आरंभ 19 जून को सुबह 07 बजकर 28 मिनट पर होगा और अगले दिन यानी  20 जून को सुबह 07 बजकर 49 मिनट पर इसका समापन होगा। प्रदोष व्रत में प्रदोष काल पूजा का बहुत महत्व है। इसलिए 19 जून दिन बुधवार को दूसरा प्रदोष रखा जाएगा। 

पूजन सामग्री : प्रदोष व्रत की पूजा में सफेद चंदन, अक्षत, पीला और लाल चंदन, कपूर, धूपबत्ती, बेलपत्र, शिव चालीसा, पंचमेवा, घंटा, शंख,हवन सामग्री, मां पार्वती के लिए श्रृंगार सामग्री,कलावा, फल, फूल और मौली-रौली पूजन सामग्री में शामिल करना बेहद महत्वपूर्ण माना गया है।
 
रवि प्रदोष की पूजाविधि :

प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठें।
स्नानादि के बाद स्वच्छ कपड़े पहनें।
घर के मंदिर की अच्छे से सफाई कर लें।
पूजा की सभी सामग्री एकत्रित करें।
एक छोटी चौकी पर शिव-परिवार की प्रतिमा स्थापित करें।
फिर शिवजी को धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
शिवलिंग पर कच्चा दूध और गंगाजल से जलाभिषेक करें।
इसके बाद सायंकाल में भगवान शिव की विधिवत पूजा करें।
शिवलिंग पर जलाभिषेक करें। प्रदोष व्रत की कथा पढ़ें।
शिवलिंग पर बेलपत्र, फूल, धतुरा, आक के फूल और भस्म चढ़ाएं।
इसके बाद शिवजी के बीज मंत्र 'ऊँ नमः शिवाय' का 108 बार जाप करें।
शिवचालीसा का पाठ करें और अंत में शिव-गौरी समेत सभी देव-देवताओं की आरती उतारें।

शिव चालीसा- 

॥दोहा॥
जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥चौपाई॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाए॥
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥
मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥
दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥
वेद माहि महिमा तुम गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥
प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥
कीन्ही दया तहं करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥
पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥
जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट ते मोहि आन उबारो॥
मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥
धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥
नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥
ॠनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥
पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥
कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥दोहा॥
नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।