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निर्जला एकादशी व्रत 17 जून को, पंडित जी से जान लें संपूर्ण पूजा-विधि और नियम

  • एकादशी व्रतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्जला एकादशी होती है। इस निर्जला-एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है।

Yogesh Joshi नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान टीम/ एजेंसीThu, 13 June 2024 08:26 PM
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एकादशी व्रतों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्जला एकादशी होती है। इस निर्जला-एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। इस बार यह 17 जून सोमवार को मनाया जाएगा।

आचार्य पप्पू पांडेय ने बताया कि इस व्रत को करने मात्र से वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रतों का पुण्यफल प्राप्त हो जाता है। जो साधक वर्ष की समस्त एकादशियों का व्रत कर पाने में असमर्थ हैं, उन्हें यह निर्जला एकादशी व्रत अवश्य करना चाहिए। पंडित सूर्यमणि पांडेय ने बताया कि निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग के अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। यह व्रत मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नजरिये से भी अति महत्त्वपूर्ण है। इसका व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। लोगों को श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए। जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

भीमसेन या पांडव एकादशी :

मां आशापुरी मंदिर के पुजारी पंडित पुरेंद्र उपाध्याय ने कहा कि इस व्रत को भीमसेन या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि पांच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन किया था और बैकुंठ गए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी पड़ा। एक बार पाण्डू पुत्र भीम ने व्यास जी से कहा कि मुझे भोजन अतिप्रिय है और मैं एक भी दिन भूखा नहीं रह सकता। क्योंकि, मुझसे भूख सहन नहीं होता है। अत: आप मुझे बताइये कि मैं एकादशी का व्रत किस प्रकार करूं। व्यासजी ने भीमसेन से कहा-हे वत्स! तुम्हें वर्ष भर के सभी एकादशी व्रतों को करने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम केवल निर्जला एकादशी व्रत कर लो। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाएं कर सकती हैं। एकादशी के ही दिन काशी की प्रसिद्ध कलश यात्रा दशाश्वमेध घाट से चलकर काशी विशेश्वर भोले बाबा के दरबार तक जाएगी और कलश में संचित देशभर की पवित्र नदियों के जल से भोले बाबा का अभिषेक किया जाएगा।

व्रत का विधान :

साधक प्रात: काल स्नान के बाद विष्णु भगवान की पूजा-अर्चना इसे करें। यह आवश्यक है कि वह पवित्रीकरण के लिए आचमन किए गए जल के अतिरिक्त अगले दिन सूर्योदय तक जल ग्रहण ना करें एवं अन्न व फलाहार का भी त्याग करें। इसके बाद अगले दिन द्वादशी तिथि में स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा कर किसी गरीब को जल से भरा कलश व दक्षिणा भेंट करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करें।

व्रती इन बातों का रखें ध्यान :

1. पवित्रीकरण के समय जल आचमन करने से लेकर अगले दिन सूर्योदय तक पानी न ग्रहण करें।

2. दिनभर कम बोलें और हो सके तो मौन रहें।

3. दिन में न सोएं। हो सके तो रात्रि में भी रतजगा करें।

4. ब्रह्मचर्य का पालन करें।

5. झूठ न बोलें, गुस्सा और विवाद से दूर रहें।

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