
गरुण पुराण: अकाल मृत्यु के बाद आत्मा के साथ क्या होता है?
गरुण पुराण में अकाल मृत्यु (दुर्घायु से पहले मृत्यु) को सबसे कष्टदायक बताया गया है। दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या या भयंकर बीमारी से हुई मृत्यु को अकाल मृत्यु कहते हैं।
गरुण पुराण में अकाल मृत्यु (दुर्घायु से पहले मृत्यु) को सबसे कष्टदायक बताया गया है। दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या या भयंकर बीमारी से हुई मृत्यु को अकाल मृत्यु कहते हैं। ऐसे में आत्मा को सामान्य मृत्यु की तरह शांति नहीं मिलती है। आइए गरुण पुराण के आधार पर जानते हैं कि ऐसी आत्मा के साथ क्या-क्या होता है।
यमदूत नहीं, बल्कि क्रूर दूत ले जाते हैं
सामान्य मृत्यु में यमदूत आत्मा को ले जाते हैं, लेकिन अकाल मृत्यु में क्रूर और भयानक रूप वाले यमदूत आते हैं। गरुण पुराण में लिखा है कि ये दूत आत्मा को रस्सी से बांधकर खींचते हैं। आत्मा को बहुत पीड़ा होती है, क्योंकि वह अचानक मृत्यु के लिए तैयार नहीं होती है। वह बार-बार अपने शरीर को देखती है और रोती है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं होता है।
प्रेत योनि में भटकना पड़ता है
अकाल मृत्यु वाली आत्मा को तुरंत यमलोक नहीं ले जाया जाता है। उसे प्रेत योनि में भटकना पड़ता है। गरुण पुराण में कहा गया है कि ऐसे प्रेत को भूख-प्यास सताती है, लेकिन कुछ खाने-पीने को नहीं मिलता है। वह अपने परिवार को देखता है, पुकारता है, लेकिन कोई सुन नहीं पाता है। यह स्थिति कई महीनों तक चलती है जब तक कि पितृ पक्ष में श्राद्ध या नारायण बलि ना की जाए।
परिवार पर पितृ दोष और संकटों की वर्षा
गरुण पुराण में स्पष्ट लिखा है कि अकाल मृत्यु से गया व्यक्ति अगर विधि-विधान से अंतिम संस्कार नहीं किया जाए तो उसकी आत्मा परिवार पर क्रोधित हो जाती है। इससे घर में बार-बार बीमारी, धन हानि, कलह, दुर्घटनाएं और संतान को कष्ट होने लगता है। यह पितृ दोष कहलाता है, जो कई पीढ़ियों तक चलता है। खासकर अगर आत्महत्या हुई हो, तो यह दोष और भी भयानक हो जाता है।
मुक्ति का एकमात्र उपाय:
- गया जी या किसी तीर्थ में 'नारायण बलि' करवाएं।
- 13वें दिन से हर साल श्राद्ध और तर्पण जरूर करें।
- हर अमावस्या को कौओं को भोजन कराएं और 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें।
- घर में प्रतिदिन एक दीपक जलाकर उस आत्मा के नाम से प्रार्थना करें।
जब तक ये क्रियाएं नहीं होती हैं, आत्मा प्रेत योनि में भटकती रहती है। इन उपायों से आत्मा को शांति मिलती है और वह अपने लोक को चली जाती है। गरुण पुराण कहता है कि जो जीते जी दूसरों का भला करता है और मरने के बाद उसके परिजन श्राद्ध करते हैं, वही सच्चे अर्थों में मुक्त होता है। अकाल मृत्यु भले ही नियति हो, लेकिन सही श्राद्ध और नारायण बलि से उस आत्मा को शांति और परिवार को पितृ दोष से मुक्ति जरूर मिलती है।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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