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जन्माष्टमी विशेष: जानिए क्यों सबसे अनूठे हैं भगवान कृष्ण

लाइव हिन्दुस्तान टीम
Wed, 24 Aug 2016 06:57 PM
जन्माष्टमी विशेष: जानिए क्यों सबसे अनूठे हैं भगवान कृष्ण

कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ के बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं। इसके कुछ कारण हैं। सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं, जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं। हंसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था।

कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास, आंसुओं से भरा हुआ था। हंसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने वाला धर्म अभी पैदा होने को है।कृष्ण अकेले हैं, जो समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है। वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है। मनुष्य का मन अब तक तोड़ कर सोचता रहा, द्वंद्व करके सोचता रहा। शरीर को इनकार करना है, आत्मा को स्वीकार करना है।

कृष्ण अकेले हैं, जो शरीर को उसकी समस्तता में स्वीकार कर लेते हैं। यह एक आयाम में नहीं, सभी आयाम में सच है। इसलिए कृष्ण का बहुत भविष्य है। पुरानी मनुष्य-जाति के इतिहास में कृष्ण अकेले हैं, जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिया है। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अहिंसक चित्त है उनका, फिर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें, लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है। तो भविष्य के लिए कृष्ण की बड़ी सार्थकता है। भविष्य में कृष्ण का मूल्य निरंतर बढ़ता ही जाना है। जब सबके मूल्य फीके पड़ जाएंगे और द्वंद्व भरे धर्म जब पीछे अंधेरे में डूब जाएंगे, तब भी कृष्ण का अंगार चमकता हुआ रहेगा। और भी निखरेगा, क्योंकि पहली दफा मनुष्य इस योग्य होगा कि कृष्ण को समझ पाए।

कृष्ण को समझना बड़ा कठिन है। आसान है यह बात समझना कि एक आदमी संसार को छोड़ कर चला जाए और शांत हो जाए। कठिन है इस बात को समझना कि संसार के संघर्ष में, बीच में खड़ा होकर और शांत हो। आसान है यह बात समझनी कि एक आदमी विरक्त हो जाए, आसक्ति के संबंध तोड़ कर भाग जाए और उसमें एक पवित्रता का जन्म हो। कठिन है यह बात समझनी कि जीवन के सारे उपद्रव के बीच, जीवन के सारे उपद्रव में अडिग हो। इसलिए कृष्ण को समझना बहुत कठिन था। लेकिन पहली दफा एक महान प्रयोग हुआ है। पहली दफा आदमी ने अपनी शक्ति का पूरा परीक्षण कृष्ण में किया है। ऐसा परीक्षण कि संबंधों में रहते हुए असंग रहा जा सके और युद्ध के क्षण पर भी करुणा न मिटे। हिंसा की तलवार हाथ में हो, तो भी प्रेम का दीया मन से न बुङो।

(‘कृष्ण स्मृति’ पुस्तक से, सौजन्य: ओशो टाइम्स इंटरनेशनल)

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