
सच बोलना सबसे बड़ी तपस्या
सत्य, तप, दया और पवित्रता धर्म के चार अंग हैं। ये चारों तत्व जिसमें होंगे, वह धर्मी है। कलियुग में दान प्रधान है। दया अर्थात दान के एक पांव के ऊपर धर्म टिका हुआ है। ज्ञान बहुतों में होता है, पर ज्ञान की दृढ़ता सब में नहीं होती।
सत्य ही सर्वस्व है। सत्य के बिना सदाचार, दान, कीर्ति, धन किसी काम के नहीं। जहां सत्य होगा, वहां ये सभी होंगे। सत्य परमात्मा है। सत्य प्रभु से भिन्न नहीं है। सत्य के द्वारा मनुष्य ईश्वर के निकट जा सकता है। जंगलों, पहाड़ों और वीराने में एकांतवास करना तपस्या नहीं है। जीवन में सच बोलना और सच की राह पर चलना ही सबसे बड़ी तपस्या है।
धर्म के चार पद हैं- सत्य, तप, दया और पवित्रता। इन चार चरणों में सत्य सर्वोपरि है। महाभारत में राजा सत्यदेव की कथा आती है। एक दिन राजा ने स्वप्न देखा कि चंचला लक्ष्मी उनके महल से कुछ समय पश्चात चली जाएगी।
एक दिन सुबह जब सत्यदेव उठे, तो उन्होंने एक सुंदर स्त्री को घर से निकलते देखा। राजा ने आश्चर्य से उस स्त्री से पूछा, ‘आप कौन हैं?’ जवाब मिला, ‘मेरा नाम लक्ष्मी है। अब मैं इस घर से जा रही हूं।’ राजा ने कहा कि आप जा सकती हैं। लक्ष्मीजी चली गईं। उसके पीछे एक सुंदर पुरुष को बाहर जाते देखकर राजा ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ उत्तर मिला, ‘मेरा नाम दान है। लक्ष्मी के जाने के बाद आप दान नहीं कर सकेंगे, इसलिए मैं आपका घर छोड़ कर जा रहा हूं।’ राजा ने कहा कि आप भी जा सकते हैं।
सत्य ही सर्वस्व
इसके बाद तीसरा सदाचार और चौथा यश, पुरुष के रूप में बाहर आए। राजा के पूछने पर लक्ष्मी तथा दान के साथ जाने की कहने पर राजा ने दोनों को जाने दिया। जब पांचवां पुरुष सत्य जाने लगा, तो राजा ने हाथ जोड़ विनयपूर्वक कहा, ‘मैंने तो आपका कभी त्याग नहीं किया। आप मुझको किसलिए छोड़ रहे हैं? आपके लिए मैंने लक्ष्मी, दान आदि सबका त्याग किया है। मैं आपको नहीं जाने दूंगा। आपके जाने पर मेरा सब कुछ चला जाएगा।’ यह सुनकर सत्य वहीं रह गया। सत्य घर में से बाहर नहीं आया, अतएव गई हुई लक्ष्मी, दान, सदाचार और यश भी वापस आ गए। सत्य ही सर्वस्व है। सत्य के बिना सदाचार, दान, कीर्ति, लक्ष्मी किस काम के? इसलिए घबराओ नहीं। जहां सत्य होगा, वहां इन सभी को रहना ही पड़ेगा।
सत्य परमात्मा है। सत्य प्रभु से भिन्न नहीं है। सत्य के द्वारा मनुष्य नारायण के निकट जा सकता है।’ परमात्मा के लिए दुख सहन करना तप है। प्रभु की आराधना करना तप है। दुख सहन करते हुए जो प्रभु का भजन करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। वाणी और व्यवहार में संयमरूप तप का पालन करो, लेकिन सत्य इन सबसे श्रेष्ठ है। कलियुग में पवित्रता नहीं है। कपड़ों पर लगा हुआ दाग छूट सकता है। कलेजे में लगा दाग नहीं छूटता। मरने के बाद जो साथ जाने वाला है, उस मन की शांति को अक्षुण्ण रखो। मन को स्वच्छ रखो।
धर्म के चार अंग
‘दया’ के लिए श्रुति में निर्देश है कि जो सिर्फ अपने लिए पका कर खाता है, वह अन्न नहीं खाता, पाप पका कर खाता है।
सत्य, तप, दया और पवित्रता धर्म के चार अंग हैं। ये चारों तत्व जिसमें होंगे, वह धर्मी है।
कलियुग में दान प्रधान है। दया अर्थात दान के एक पांव के ऊपर धर्म टिका हुआ है। राजा परीक्षित ने जब कलियुग से राज्य को छोड़कर जाने को कहा, तो कलि ने पूछा कि मैं कहां रहूं? मेरे रहने को जगह दें। तब परीक्षित ने उसे रहने के लिए चार स्थान बताए- जुआ, हिंसा, स्त्री-संग और मदिरा। इन चार स्थानों में असत्य, निर्दयता, आसक्ति और मद ये चार अधर्म रहते हैं। इनसे कलि को संतोष नहीं हुआ। उसने कहा कि ये संब तो गंदी जगह हैं, एक स्थान मेरे को और दें। राजा ने उसे स्वर्ण में रहने की अनुमति दे दी। इस प्रकार स्वर्ण के माध्यम से कलि को राजा में प्रवेश करने का अवसर मिला।
भोग नहीं, उपयोग करें
ज्ञान बहुतों में होता है, पर ज्ञान की दृढ़ता सब में नहीं होती। प्रारब्ध के अनुसार जो मिलना है, वही मिलेगा। फिर भी मनुष्य झूठ बोलता है। संपत्ति, संतान और लक्ष्मी तो प्रारब्ध से मिलती है। जितना लिखा है, उतना तो मिलेगा ही। मृत्यु के समय मनुष्य में सयानापन आता है, पर वह किस काम का?
यदि प्रभु तुम्हें अधिक दें, तो पाप न करो। पाप की निवृत्ति होने पर ही इंद्रियों को भक्ति रस का सुख मिलता है। इंद्रियां भोग का नहीं, भक्ति का साधन हैं, इसलिए इंद्रियां नहीं बिगड़ें, इसका ध्यान रखो। जितेंद्रिय होने की कोशिश करो।
संपत्ति होने पर यदि संतोष नहीं हाे, तो संपत्ति दुख का कारण बन जाती है। संतोषी व्यक्ति को जब सपंत्ति की प्राप्ति होती है, तो वह उसका उपयोग विवेक से करता है।
कितनों को तो खाने को नहीं मिलता, इसलिए दुखी रहते हैं। पर कितने ही ऐसे भी हैं, जो अधिक खाकर अजीर्ण से पीड़ित रहते हैं।
‘लक्ष्मी’ माता है। उसका उपयोग तो किया जा सकता है, पर उसका स्वामी नहीं बना जा सकता। उसका भोग नहीं करना है।
पाप का जनक लोभ
‘लक्ष्मी’ मेरी है, ऐसा समझने वाले को लक्ष्मी मारती है। पर लक्ष्मी नारायण की है, ऐसा समझने वाले का उद्धार करती है। वृद्धावस्था में क्रोध और काम तो शांत होते हैं, पर लोभ बढ़ता है। लोभ पाप का जनक है। पाप बढ़ने पर लोग दुखी होते हैं।
लोभ को संतोष से जीतो। मनुष्य जब सोचता है कि मुझे कम मिला है, तभी पाप करता है, इसलिए जो भी मिला है, वह मेरी योग्यता से अधिक है, ऐसा समझकर संतोष रखो, जिससे पाप न करना पड़े। जो संतोष से लोभ को मारता , उसकी बुद्धि भगवान में स्थिर रहती है। मन को शुद्ध करने के लिए सत्कर्म जरूरी है। मन से पूछो कि मुझे जो मिला है- क्या मैं उसके योग्य हूं? इस पर जब विचार करोगे, तो लगेगा कि जीव ने बहुत पाप किए हैं।
जीव जब देता है, तो उसके देने में संकोच रहता है। पर ईश्वर जब देता है, तो उसमें कोई संकोच-सीमा नहीं रहती। भगवान से यदि कोई दूसरी वस्तु मांगोगे, तो उसे देकर वे छिटक जाएंगे, इसलिए उनसे तो स्वयं उन्हें छोड़कर अन्य वस्तु की याचना ही न करो।





