शनि की साढ़ेसाती से लेकर सोमवती अमावस्या तक होती है पीपल के पेड़ की पूजा, जानें शास्त्रों में पीपल के पेड़ के बारे में

Feb 10, 2026 07:38 am ISTAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान, डॉ. प्रकाशचंद्र गंगराड़े
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तैत्तिरीय संहिता में प्रकृति के सात पावन वृक्षों में पीपल की गणना है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी पीपल की पवित्रता के संदर्भ में उल्लेख मिलता है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रूप है

शनि की साढ़ेसाती से लेकर सोमवती अमावस्या तक होती है पीपल के पेड़ की पूजा, जानें शास्त्रों में पीपल के पेड़ के बारे में

तैत्तिरीय संहिता में प्रकृति के सात पावन वृक्षों में पीपल की गणना है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी पीपल की पवित्रता के संदर्भ में उल्लेख मिलता है। पद्मपुराण के अनुसार पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का रूप है, इसीलिए इसे धार्मिक क्षेत्र में श्रेष्ठ देव वृक्ष की पदवी मिली है। अनेक अवसरों पर पीपल की पूजा का विधान है। सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु एवं लक्ष्मी का वास होता है।

पुराणों में पीपल (अश्वत्थ) का बहुत महत्व बताया गया है। स्कंद पुराण के अनुसार, पीपल के पेड़ में त्रिवेद यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है। मान्यता है कि पीपल के मूल (जड़) में भगवान ब्रह्मा, तने में भगवान विष्णु और ऊपरी शाखाओं में भगवान शिव विराजते हैं। इसके अलावा, पीपल में पितरों का वास भी माना जाता है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं- ‘अश्वत्यः सर्ववृक्षाणां।’

(श्रीमद्भगवद्गीता 10.26)

अर्थात मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूं। इस कथन में उन्होंने अपने आपको पीपल के वृक्ष में समासीन घोषित किया है।

पद्मपुराण के मतानुसार पीपल को प्रणाम करने और उसकी परिक्रमा करने से आयु लंबी होती है। जो व्यक्ति इस वृक्ष को पानी देता है, वह सभी पापों से छुटकारा पाकर स्वर्ग में जाता है। पीपल में पितरों का वास माना गया है। इसमें सब तीर्थों का निवास भी होता है, इसलिए मुंडन आदि संस्कार पीपल के नीचे करवाने का प्रचलन है।

महिलाओं में यह विश्वास है कि पीपल की निरंतर पूजा-अर्चना, परिक्रमा करके जल चढ़ाते रहने से संतान की प्राप्ति होती है। पुण्य मिलता है। अदृश्य आत्माएं तृप्त होकर सहायक बनती हैं। कामना पूर्ति के लिए पीपल के तने पर सूत लपेटने की भी परंपरा है। पीपल की जड़ में शनिवार को जल चढ़ाने और दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। शनि की जब साढ़ेसाती होती है, तो लोग पीपल के वृक्ष का पूजन और परक्रिमा करते हैं। इससे शनि जनित कष्ट कम हाेते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है।

इसकी छाल यज्ञ, हवन, पूजापाठ, पुराण कथा आदि के लिए श्रेष्ठ मानी गई है। पीपल के पत्तों से शुभ काम में वंदनवार भी बनाए जाते हैं। वातावरण के दूषित तत्वों, कीटाणुओं को नष्ट करने के कारण पीपल को देवतुल्य माना जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से पीपल निरंतर 24 घंटे आक्सीजन देने वाला अद्भुत वृक्ष है। इसके निकट रहने से प्राणशक्ति बढ़ती है। इसके अलावा पीपल के पत्ते, फल आदि में औषधीय गुण होने के कारण यह रोगनाशक भी होता है।

(साभार : ‘पुस्तक महल’, दिल्ली)

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शार्ट बायो

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