Sawan Somvar vrat katha:साहूकार के बेटे से जुड़ी शिवजी की सावन सोमवार व्रत कथा

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Sawan Somvar vrat katha : सावन के सोमवार में शिवजी के भक्त साहूकार से जुड़ी यह कथा पढ़ी जाती है। आज सावन का तीसरा सोमवार है। यहां पढ़ें संपूर्णकथा

Sawan  Somwar Vrat katha
Sawan Somwar Vrat katha

Sawan Somwar vrat katha: आज सावन का तीसरा सोमवार और नाग पंचमी भी है। इस दिन अगर सोमवार का व्रत करते हैं तो भगवान शिव की कहानी पढ़नी चाहिए। पहले शिवजी की पूजा करें और फिर नाग देवता की पूजा करें। इसके बाद अभिषेक करें।

सावन सोमवार व्रत कथा प्रारंभ
धनवान साहूकार था परम शिव भक्त था। उसके पास धन-दौलत सब कुछ था, लेकिन संतान नहीं थी। पुत्र प्राप्ति के लिए सोमवार व्रत और शिवजी का पूजन करता था। शाम के समय शिव मंदिर में जाकर दीपक जलाया करता था। एख दिन भगवान शिव से माता पार्वती ने कहा कि महाराज यह साहूकार आपका परम भक्त है। आपका व्रत करता है और सदैव पूजन करता है। आप इसकी मनोकामना क्यों नहीं पूरी करते। भगवान शिव ने कहा कि हे पार्वती, इसने जैसा बीज बोता है वैसा ही फसल काट रहा है। माता पार्वती ने कहा-अपने भक्तों के दुख अवश्य ही दूर करना चाहिए। माता पार्वती का आग्रह देखकर भगवान शिव ने कहा- हे पार्वती, इसका कोई पुत्र नहीं है इस चिंता में यह अति दुखी है। इसके भाग्य में पुत्र न होने पर भी इसके पुत्र प्राप्ति का वर देता हूं। परंतु पुत्र अल्पायु होगा। 12 वर्ष बाद मृत्यु को प्राप्त हो जाएगा। इससे अधिक में कुछ नहीं कर सकता हूं।

साहूकार के पुत्र हुआ, लेकिन साहूकार खुश नहीं था

माता पार्वती और भगवान शिव जी की बात को साहुकार सुन रहा था, लेकिन उससे इससे कोई प्रसन्नता ना हुई। लेकिन फिर भी वह भगवान शिव का पूजन और व्रत करता रहा। एक दिन साहूकार की स्त्री गर्भवती हुई और दसवें महीने में एक अति सुंदर पुत्र को जन्म दिया। साहुकार इससे खुश नहीं था, क्योंकि उसे पता था कि यह सिर्फ 12 साल तक है। जब बालक 11 वर्ष का हो गया तो उसकी माता ने उसके पिता से उसका विवाह करने के लिए कहा। साहूकार ने कहा कि अभी मैं इसका विवाह नहीं करुंगा। अपने पुत्र को काशी पढ़ने के लिए भेजूंगा। साहूकार ने बालक के मामा को बुलाकर बहुत सारा धन देकर कहा- तुम बालक को काशी पढ़ने के लिए ले जाओ और रास्ते में जिस स्थान पर भी जाओ यज्ञ करते, ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना। दोनों मामा-भांजे चल पड़े। रास्ते में एक शहर पड़ा। उस शहर में राजा की कन्या का विवाह था। लेकिन जो राजकुमार विवाह करने के लिए आया था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता को डर था कि कहीं राजकुमार को देखकर राजकुमारी और उसके माता-पिता विवाह में किसी प्रकार की अड़चन न पैदा कर दें।

राजकुमारी से हुआ विवाह-

राजकुमार के पिता ने सेठ के अति सुंदर पुत्र को देखा, तो सोचा क्यों ना इससे शादी कर दूं और विदा काने राजकुमार के साथ कर दूंगा। उन्होंने उस लड़के और उसके मामा से बात की। वे राजी हो गए। विवाह कार्य बहुत अच्छी तरह से संपन्न हुआ। सेठ का पुत्र जिस समय जाने लगा तो उसने राजकुमार की चुनरी के पल्ले पर लिख दिया- तेरा विवाह मेरे साथ हुआ लेकिन जिस राजकुमार के साथ तुमको भेजेंगे वह एक आंख से काना है। मैं काशी पढ़ने जा रहा हूं। राजकुमारी ने अपनी चुनरी पर ऐसा लिखा पाया तो उसने काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया।

काशी में लड़के ने त्याग दिए प्राण

उधर सेठ का लड़का काशी पहुंच गया। वहां जाकर मामा ने यज्ञ करना और लड़के ने पढ़ना शुरू किया। जब लड़के की आयु पूरे 12 साल की हो गई, लड़के ने मामाजी से कहा- मामाजी मेरी तबीयत ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि अंदर जाकर सो जाओ। जब अंदर जाकर मामा ने देखा तो भांजा मृत पड़ा है तो उसको बहुत दुख हुआ। मामा ने सोचा कि अगर अभी रोना शुरू करुंगा तो यज्ञ का कार्य अधूरा रह जाएगा। उसने जल्दी से यज्ञ का कार्य समाप्त किया। ब्राह्मणों के जाने के बाद उसने भांजे के जाने का विलाप शुरू किया। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती भी उधर से जा रहे थे। जब उन्होंने जोर-जोर से रोने की आवाज सुनी तो पार्वती जी ने कहा- महाराज, कोई दुखिया रो रहा है। इसके कष्ट को दूर कीजिए। जब शिव-पार्वती वहां पहुंचे तो देखा लड़का मृत पड़ा है।

लड़के को देखकर माता पार्वती ने कहा कि महाराज यह तो सेठ का पुत्र है जिसे आपने अपने वरदान से उत्पन्न किया था। भगवान शिव ने कहा कि देवी यह अपनी आयु भोग चुका है। तब माता पार्वती ने कहा कि महाराज आप लड़के को आयु का वरदान दीजिए वरना इसके माता-पिता विलाप करते-करते प्राण त्याग देंगे। भगवान शिव के आशीर्वाद से लड़का जीवित हो उठा।

शिक्षा पूरी होने के बाद लड़का अपने मामा के साथ रास्ते में यज्ञ और दान-दक्षिणा करते हुए घर की ओर चल पड़ा। रास्ते में राजा ने उसे पहचान लिया और उसका स्वागत किया। राजा ने बहुत सारे दास-दासियों के साथ अपनी पुत्री राजकुमारी को विदा किया। जब वे शहर के निकट आए तो मामा ने कहा कि मैं पहले तुम्हारे घर जाकर माता-पिता को खबर देकर आता हूं। जब लड़के का मामा घर पहुंचा तो देखा कि लड़के के माता-पिता घर की छत पर बैठे थे। उन्होंने यह प्रण किया था कि अगर उनका पुत्र सकुशल लौट आया तो राजी-खुशी नीचे आ जाएंगे, वरना छत से गिरकर प्राण त्याग देंगे। जब उस लड़के के मामा ने घर आकर बताया कि पुत्र वापस लौट आया है तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ। सेठ-सेठानी ने अपने पुत्र और उसकी पत्नी का स्वागत किया। सभी आनंदपूर्वक रहने लगे।

शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।

ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।

हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।

त्रिगुण रूप निरखत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।

सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।

जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥

खत त्रिभुवन जन मोहे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमालाधारी।

त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघंबर अंगे।

सनकादिक गरुड़ादिक भूतादिक संगे॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डल चक्र त्रिशूलधारी।

जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।

प्रणवाक्षर के मध्ये ये तीनों एका॥ ओम जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।

कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ओम जय शिव ओंकारा॥ स्वामी ओम जय शिव ओंकारा॥

Anuradha Pandey

लेखक के बारे में

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


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