Sawan shivratri vrat katha: सावन शिवरात्रि पर पढ़ें यह व्रत कथा, भगवान शिव पूरी करेंगे हर कामना
Sawan Shivratri Vrat Katha in Hindi: हर महीने की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि मनाई जाती है। लेकिन सावन माह की शिवरात्रि का खास महत्व है। यहां पढ़ें सावन शिवरात्रि की व्रत कथा।

Sawan Shivratri vrat katha in hindi: श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। इस साल सावन शिवरात्रि 11 अगस्त, मंगलवार को है। सावन शिवरात्रि के दिन कावड़ जल चढ़ता है और इस दिन भगवान शिव का पूजन विशेष शुभ फलदायी माना गया है। इस दिन शिव भक्त भगवान शंकर की पूजा करने के साथ ही व्रत कथा का पाठ करते हैं या सुनते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्रत कथा पढ़ने या सुनने से व्यक्ति को भगवान शिव की कृपा से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। यहां पढ़ें सावन शिवरात्रि की पौराणिक व्रत कथा।
शिकारी को बनाया साहूकार ने बंधक
प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी थी। वह अपने परिवार का पालन-पोषण पशुओं की हत्या करके करता था। उसने एक साहूकार से कर्ज लिया था। कर्ज को समय पर नहीं चुका पाने के कारण साहूकार ने क्रोधित होकर शिकारी को बंधक बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। बंधक में रहते हुए शिकारी ने भगवान शिव से जुड़ी धार्मिक बातें सुनी और शिवरात्रि व्रत किया और कथा भी सुनी।
शाम को जब साहूकार ने शिकारी को बुला पूछा कि कर्ज कब तक चुका सकते हो, तब शिकारी ने अगले दिन कर्ज चुकाने का वादा किया। साहूकार ने शिकारी को बंधन से मुक्त कर दिया। शिकारी जंगल में शिकार के लिए निकल गया। दिन भर बंदी गृह में रहने के कारण शिकारी को बहुत तेज भूख-प्यास लग रही थी।
जंगल में घंटों भटकने के बाद शिकारी एक जलाशय के पास पहुंचा। पानी पीकर वह एक पेड़ पर चढ़कर शिकार का इंतजार करने लगे। शिकारी जिस पेड़ पर बैठा था वह बेल पत्र का पेड़ था और उसके नीचे एक शिवलिंग था जो बेलपत्रों से ढका हुआ था। भूख और प्यास से थका शिकारी उसी मचान पर बैठा रहा।
अनजाने मे हो गया शिवरात्रि व्रत और पूजन
शिकारी ने मचान बनाते समय पेड़ से कुछ टहनियां तोड़ी थीं, संयोग से वह टहनियां शिवलिंग पर जाकर गिरीं। इस तरह से शिकारी के दिन-भर भूखे प्यास रहकर अनजाने में शिवरात्रि का व्रत हो गया और शिवलिंग का पूजन भी। रात्रि का एक प्रहर बीत जाने के बाद एक मृगी (हिरण) तालाब के किनारे पानी पीने के लिए पहुंची। शिकारी ने उसे मारने के लिए अपना धनुष उठाया और फिर संयोग से उसके हाथ से कुछ पत्ते और जल की बूंदे नीचे शिवलिंग पर गिर गईं। अनजाने में शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा संपन्न हो गई।
इस मृगी ने शिकारी से निवेदन किया कि मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। अपने प्रिय की तलाश कर रही हूं। मैं वचन देती हूं कि अपने पति से मिलकर जल्द ही तुम्हारे पास लौट आऊंगी। तब मुझे मार लेना। शिकारी ने उसे जाने दिया। अब रात्रि का आखिरी प्रहर बीतने वाला था। फिर एक और मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी ने उसे मारने के लिए अपना धनुष उठा लिया। ये देखकर मृगी बोली कि मैं इन बच्चों को पिता को सौंपकर लौट आऊंगी। तब मुझे मार देना। शिकारी ने उसे भी जाने दिया।
शिकारी ने लिया हिंसा नहीं करने का फैसला
शिकार नहीं कर पाने के कारण वह परेशान हो गया। पेड़ पर बैठकर बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता रहा। इस तरह से उसके तीसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई। सुबह होने लगी तभी एक मृग उस रास्ते पर आया। अब शिकारी ने सोचा कि कुछ भी हो जाए वह इस बार शिकार जरूर करेगा।
शिकारी को देखकर मृग ने कहा कि अगर तुमने मुझसे पहले आने वाली मृगियों और बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी शीघ्र ही मार दो। क्योंकि मैं उन मृगियों का पति हूं। अगर तुमने उन्हें जाने दिया है, तो मुझे भी कुछ समय के लिए जीवनदान दे दो। मैं वचन देता हूं कि उनसे मिलकर मैं तुम्हारे पास उपस्थित हो जाऊंगा। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। अनजाने में ही सही लेकिन शिकारी के व्रत, रात्रि-जागरण और शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से उसका मन निर्मल हो गया था। थोड़ी देर में वह मृग अपनी पत्नियों के साथ शिकारी के सामने आ गया। जंगली पशुओं की सत्यता और प्रेम भावना को देखकर शिकारी को अंदर ही अंदर ग्लानि महसूस हुई। उसकी आंखों से आंसू निकल पड़े। उसने मृग परिवार को जाने दिया और जीवन में कभी हिंसा नहीं करने का फैसला लिया।
भगवान शिव ने दिया आशीर्वाद
शिकारी के भाव और पूजन से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उसे सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान किया। साथ में उसे गुह नाम प्रदान किया। कहा जाता है कि ये वही गुह था जिसके साथ भगवान श्रीराम ने मित्रता की थी।
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