Guru Purnima Vrat Katha: गुरु पूर्णिमा पर पढ़ें भगवान सत्यनारायण की व्रत कथा
Guru Purnima Satyanarayan Vrat Katha: गुरु पूर्णिमा पर भगवान सत्यनारायण की कथा की जाती है। इससे श्रीहरि प्रसन्न होते हैं। चतुर्मास में इसका बहुत पुण्य फल मिलता है।

गुरु पूर्णिमा पर घरों में की भगवान सत्यानारायण की कथा का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन किसी योग्य विद्वान को बुलवाकर उससे अपने घर में सत्यनारायण की कथा का आयोजन कराएं। इसके लिए पहले गणपति भगवान का पूजन करें, इसके बाद नवग्रहों का पूजन करें और इसके बाद भगवान श्रीहरि का षोडशमातृका पूजन किया जाता है। चतुर्मास में यह कथा करवाने से बहुत लाभ होते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इससे श्रीहरि प्रसन्न होते हैं। और इसके लिए घर में तैयार करें मंडप और प्रसाद फिर सुनें कथा
कथा के लिए सजाएं मंडप
सत्यनारायण भगवान की कथा के लिए घर में केले के पत्तों का मंडप तैयार किया जाता है और सभी भाई बांधवों को बुलाकर कथा की जाती है। इस कथा में प्रसाद का बहुत मूल्य है, इसलिए इस कथा का प्रसाद छोड़कर ना जाएं। प्रसाद के लिए पंजीरी और चर्णामृत बनाया जाता है और शंख की ध्वनि के साथ कथा का आरंभ किया जाता है। -कथा इस प्रकार है-
इति श्रीसत्यनारायण व्रत कथा प्रारंभ
सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय
एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु- इस कलियुग में कैसे हम मनुष्यों को प्रभु भक्ति मिल सकती है, कैसे हमारा उद्धार होगा, हमें इसके बारे में जानने की इच्छा है तो प्रभु हमे इसके बारे में बताएं। हमें बताएं कि कौन सा व्रत करने पर पुण्य को हमे मिले ही और मनवांछित चीज भी मिले। ऐसा सुनने की हमारी इच्छा है। श्रीसूतजी ने कहा-हे ऋषियो! आप सबने सभी प्राणियों के हित के लिए यह बहुत ही अच्छी बात पूछी है। इसलिए सभी की परोपकार के लिए मैं आज इस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों से कहूंगा जिस व्रत को नारद जी ने भगवान कमलापति से पूछा था।
एक समय की बात है, योगीराज नारदजी भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि कैसे प्राणी अपने कर्मों के द्वारा अनेकों दुःखों से पीड़ा में हैं, ऐसा देखकर नारद जी ने मन में सोचा कि मैं ऐसा क्या करूं कि इनके दुःख का नाश हो। ऐसा मन में सोचकर विष्णु लोक को गए। वहां कमलापति श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले भगवान् नारायण को देखा। जिनके हाथों में शंख , चक्र, गदा औ कमल थे, नारद जी ने उनकी स्तुति की और बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन और वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आप अनंत हो, आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। मैं निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है! नारदजी की स्तुति सुन भगवान बोले, आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए आपका यहां आगमन हुआ है, नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो कौन से ऐसे प्रयत्न हैं जिससे मनुष्य के दुख थोड़ी सी कोशिशों से दूर हो जाएंगे। श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज मैं उसे तुमसे कहता हूं।
श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। श्रीभगवान् ने कहा-नारद! दुःख, शोक आदि को दूर करने वाला धन-धान्य को बढ़ाने वाला, सौभाग्य, संतान को देने वाला, सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला-भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य श्रीसत्यनारायण की कथा शाम के समय ब्राह्मणों एवं बन्धुओं के साथ धर्मपारायण होकर पूजा करें। भक्ति भाव से सवाया मात्रा में नेवेद्य, केले का फल, घी, दूध, और गेहूं का चूर्ण लेवे। गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर तथा गुड़ लें और सब भक्षण योग्य पदार्थ एकत्रित करके भगवान्|सत्यनारायण को अर्पण करना चाहिए, इति श्री सत्यनाराण कथा प्रथम अध्याय समाप्त, कथा के बाकी के अध्याय आप इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं


