satyanarayan vrat katha:यहां पढ़ें भगवान सत्यानारायण की संपूर्ण कथा, कहानी हिंदी में
satyanarayan vrat katha kahani in hindi: आज ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि है। इस दिन श्री विष्णु भगवान की पूजा और व्रत किया जाता है। शाम के समय कथा भी पढ़ी जाती है।

आज ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा है। इसे वट पूर्णिमा भी कहते हैं। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए व्रत करती हैं और शाम को सत्यानारायण की कथा भी सुनी जाती है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी सत्यनारायण भगवान की कथा सुनता है और सुनाता है, उसे बहुत फल मिलता है। शाम के समय बंधु बांधवों के साथ बैठकर केले के पत्तों का मंडप सजाकर सत्यनारायण की कथा की जाती है। इसमें पंजीरी और चरणामृत का प्रसाद बनाया जाता है।
भविष्य पुराण में कथन है कि पूर्णिमा बुहत अच्छी तिथि है, भगवान विष्णु की पूजा की। इस दिन सुब गंगा स्नान कर दान करना उत्तम होता है और शाम के समय सत्यनारायण की कथा की जाती है। गंगा नदी या पवित्र नदी में स्नान करके दान में सोना, तिल, मधु, घी, भोजन व जल सहित जलपात्र के दान का विशेष महत्व है। इस दिन व्रत भी रखा जाता है।
सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय
एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, अठ्ठासी हजार ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु- इस कलयुग में मनुष्यों को प्रभु भक्ति कैसे मिल सकती है? उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ -मुझे बताइए जिससे ऐसा पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिले। ऐसा सुनने की हमारी इच्छा है। ऋषियों ने कहा-आप तो इतिहास एवं पुराणों के ज्ञाता है। अत: आपसे एक निवेदन है, थोडे ही समय में पुण्य मिल सके और मनोवाज्छित फल की भी प्राप्ति हो सके। श्रीसूतजी ने कहा-हे ऋषियो! आप सबने सभी प्राणियों के हित के लिए यह बात पूछी है, क्योंकि परोपकार ही तो संतों का लक्षण है। इसलिए उस श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों से कहूंगा जिस व्र त को नारद जी ने भगवान कमलापति से पूछा था।
एक समय की बात है, योगीराज नारदजी अनेक लोकों में घूमते हुए मृत्यु लोक में आ पहुंचे। वहां प्राणी अपने कर्मों के द्वारा अनेकों दुःखों से पीडित हैं, ऐसा देखकर नारद जी ने मन में सोचा कि किस कोशिश से इनके दुःख का नाश हो। ऐसा मन में सोचकर विष्णु लोक को गए। वहां श्वेतवर्ण और चार भुजाओं वाले भगवान् नारायण को देखा। जिनके हाथों में शंख , चक्र, गदा औ कमल थे, नारद जी उनकी स्तुति करने लगे। नारद जी बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। मैं निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है। नारदजी की स्तुति सुन भगवान बोले, आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए आए है? नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़ी सी कोशिशों से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है। श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूं।
श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। श्रीभगवान् ने कहा-नारद! दुःख, शोक आदि को दूर करने वाला धन-धान्य को बढ़ाने वाला, सौभाग्य, संतान को देने वाला, सभी स्थानों पर विजयश्री दिलाने वाला-भक्ति और श्रद्धा के साथ किसी भी दिन मनुष्य श्रीसत्यनारायण की कथा शाम के समय ब्राह्मणों एवं बन्धुओं के साथ धर्मपारायण होकर पूजा करें। भक्ति भाव से सवाया मात्रा में नेवेद्य, केले का फल, घी, दूध, और गेहूं का चूर्ण लेवे। गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर तथा गुड़ लें और सब भक्षण योग्य पदार्थ एकत्रित करके भगवान्|सत्यनारायण को अर्पण करना चाहिए
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का दूसरा अध्याय
सूत जी बोले, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूं, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा कि हे विप्र! दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूों घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला, मैं निर्धन हूं। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूं। हे भगवान! अगरआप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान का पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।
वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूंगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नींद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बांधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया।
उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा।
सूतजी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूं? ऋषि बोले, हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है। सूतजी बोले, हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वे सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऐश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बांधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया
ब्राह्मण बोला-हे प्रभो! मैं बहुत निर्धन ब्राह्मण हू, भिक्षा के लिये ही पृथ्वी पर घूमता हू। हे भगवन्! आप इस निर्धनता (दरिद्रता) से छुटकारा दिलाने वाला कोई उपाय जानते हों, तो कृपा पूर्वक बतलाइये। वृद्धब्राह्मण रूपधारी भगवान् श्रीविष्णुजी ने कहा-हे ब्राह्मणदेव! भगवान् सत्यनारायण मनोवांछित फल देने वाले हैं। इसलिये हे विप्र! तुम सत्यनारायण का ब्रत एवं पूजन करो, सत्यव्रत करने से मनुष्य सभी दुःखों से मुक्त होता है। ब्राह्मण को यत्न पूर्वक ब्रत का सम्पूर्ण विधान बतलाकर बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करने वाले सत्यनारायण भगवान् वहीं अन्तर्धान हो गये। जिस ब्रत को वृद्ध ब्राह्मण ने बतलाया हे, उस ब्रत को मैं निश्चय ही करूंगा। यह निश्चय कर निर्धन ब्राह्मण को रात्रि में नींद नहीं आयी।
चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूंगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियां रख उस नगर में बेचने गया जहां धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है। बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूं का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियां लेकर घर गया। वहां उसने अपने बंधु-बांधवों को बुलाकर सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का दूसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का तीसरा अध्याय
सूतजी बोले, हे श्रेष्ठ मुनियों, अब आगे की कथा कहता हूं। पहले समय में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्यवक्ता और जितेन्द्रिय था। प्रतिदिन देव स्थानों पर जाता और निर्धनों को धन देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली तथा सती साध्वी थी। भद्रशीला नदी के तट पर उन दोनो ने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत किया। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य आया। उसके पास व्यापार करने के लिए बहुत सा धन भी था। राजा को व्रत करते देखकर वह विनय के साथ पूछने लगा, हे राजन ! भक्तिभाव से पूर्ण होकर आप यह क्या कर रहे हैं? मैं सुनने की इच्छा रखता हूं तो आप मुझे बताएं।
राजा बोला, हे साधु! अपने बंधु-बांधवों के साथ पुत्रादि की प्राप्ति के लिए एक महाशक्तिमान श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत व पूजन कर रहा हूं। राजा के वचन सुन साधु आदर से बोला, हे राजन! मुझे इस व्रत का सारा विधान कहिए। आपके कथनानुसार मैं भी इस व्रत को करुँगा। मेरी भी संतान नहीं है और इस व्रत को करने से निश्चित रुप से मुझे संतान की प्राप्ति होगी। राजा से व्रत का सारा विधान सुन, व्यापार से निवृत हो वह अपने घर गया।
साधु वैश्य ने अपनी पत्नी को संतान देने वाले इस व्रत का वर्णन कह सुनाया और कहा कि जब मेरी संतान होगी तब मैं इस व्रत को करुंगा। साधु ने इस तरह के वचन अपनी पत्नी लीलावती से कहे। एक दिन लीलावती पति के साथ आनन्दित हो सांसारिक धर्म में प्रवृत होकर सत्यनारायण भगवान की कृपा से गर्भवती हो गई। दसवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। दिनों दिन वह ऐसे बढ़ने लगी जैसे कि शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है। माता-पिता ने अपनी कन्या का नाम कलावती रखा।
एक दिन लीलावती ने मीठे शब्दों में अपने पति को याद दिलाया कि आपने सत्यनारायण भगवान के जिस व्रत को करने का संकल्प किया था उसे करिए। साधु बोला कि हे प्रिये! इसके विवाह पर करुंगा। इस प्रकार अपनी पत्नी को आश्वासन देकर वह नगर को चला गया। कलावती पिता के घर में रह वृद्धि को प्राप्त हो गई।
साधु ने एक बार नगर में अपनी कन्या को सखियों के साथ देखा तो तुरंत ही दूत को बुलाया और कहा कि मेरी कन्या के योग्य वर देख कर आओ। साधु की बात सुनकर दूत कंचन नगर में पहुंचा और वहां देखभाल कर लड़की के सुयोग्य वाणिक पुत्र ले आया। सुयोग्य लड़के को देख साधु ने बंधु-बांधवों को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह कर दिया लेकिन दुर्भाग्य से वह तब भी भी श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत करना भूल गया। इस पर श्री भगवान क्रोधित हो गए और श्राप दिया कि साधु को दुख मिले। अपने कार्य में कुशल साधु बनिया जमाई को लेकर समुद्र के पास स्थित होकर रत्नासारपुर नगर में गया। वहां जाकर दामाद-ससुर दोनों मिलकर चन्द्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने लगे। एक दिन भगवान सत्यनारायण की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भाग रहा था। उसने राजा के सिपाहियों को अपना पीछा करते देख चुराया हुआ धन वहां रख दिया जहां साधु अपने जमाई के साथ ठहरा हुआ था। राजा के सिपाहियों ने साधु वैश्य के पास राजा का धन पड़ा देखा तो वह ससुर-जमाई दोनों को बांधकर प्रसन्नता से राजा के पास ले गए और कहा कि उन दोनों चोरों हम पकड़ लाएं हैं, आप आगे की कार्यवाही की आज्ञा दें।
राजा की आज्ञा से उन दोनों को कठिन कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन भी उनसे छीन लिया गया। श्रीसत्यनारायण भगवान से श्राप से साधु की पत्नी भी दुखी हुई। घर में जो धन रखा था चोर चुरा ले गए। शारीरिक तथा मानसिक पीड़ा व भूख प्यास से अति दुखी हो अन्न की चिन्ता में कलावती के ब्राह्मण के घर गई। वहां उसने श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा फिर कथा भी सुनी वह प्रसाद ग्रहण कर वह रात को घर वापिस आई। माता के कलावती से पूछा कि हे पुत्री अब तक तुम कहां थी? तेरे मन में क्या है। कलावती ने अपनी माता से कहा, हे माता ! मैंने एक ब्राह्मण के घर में श्रीसत्यनारायण भगवान का व्रत देखा है। कन्या के वचन सुन लीलावती भगवान के पूजन की तैयारी करने लगी। लीलावती ने परिवार व बंधुओं साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और वर मांगा कि मेरे पति तथा जमाई शीघ्र घर आ जाएं। साथ ही यह भी प्रार्थना की कि हम सब का अपराध क्षमा करें।
श्रीसत्यनारायण भगवान इस व्रत से संतुष्ट हो गए और राजा चन्द्रकेतु को सपने में दर्शन दे कहा -हे राजन! तुम उन दोनो वैश्यों को छोड़ दो और उनका जो धन लिया है उसे वापस कर दो। नहीं तो मैं तुम्हारा धन राज्य व संतान सभी को नष्ट कर दूंगा। राजा को यह सब कहकर वह अन्तर्धान हो गए। प्रात:काल सभा में राजा ने अपना सपना सुनाया फिर बोले कि वणिक पुत्रों को कैद से मुक्त करो। दोनो से राजा ने बोला, हे महानुभावों ! भाग्यवश ऎसा कठिन दुख तुम्हें प्राप्त हुआ है लेकिन अब तुम्हें कोई भय नहीं है। ऎसा कह राजा ने उन दोनों को नए वस्त्राभूषण भी पहनाए और जितना धन उनका लिया था उससे दोगुना धन वापिस कर दिया। दोनो वैश्य अपने घर को चल दिए।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तीसरा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का चौथा अध्याय
सूतजी बोले, वैश्य ने मंगलाचार कर यात्रा आरंभ की और अपने नगर की ओर चल दिए। उनके थोड़ी दूर जाने पर एक दण्डी वेशधारी श्रीसत्यनारायण ने उनसे पूछा, हे साधु तेरी नाव में क्या है? वणिक हंसता हुआ बोला: हे दण्डी ! आप क्यों पूछते हो? क्या मेरा धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो बेल व पत्ते हैं। वैश्य के कठोर वचन सुन भगवान बोले, तुम ऐसा बोल रहे हो तो तुम्हारी बात सही हो जाए। दण्डी ऐसे वचन कह वहां से दूर चले गए। कुछ दूर जाकर समुद्र के किनारे बैठ गए। दण्डी के जाने के बाद साधु वैश्य ने नाव को ऊंची उठते देखा और बेल पर पत्ते देख मूर्छित हो जमीन पर गिर पड़ा।
मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया तब उसका दामाद बोला कि आप शोक ना मनाएं, यह दण्डी का शाप है इसलिए हमें उनकी शरण में जाना चाहिए, तभी हमारी मनोकामना पूरी होगी। दामाद की बात सुनकर वह दण्डी के पास पहुंचा और भक्तिभाव से बोला, मैंने आपसे असत्य वचन कहे थे उनके लिए मुझे क्षमा दें, ऐसा कह कहकर रोने लगा । तब साधु ने कहा मेरी आज्ञा से बार-बार तुम्हें दुख प्राप्त हुआ है। तू मेरी पूजा से विमुख हुआ। साधु बोला, हे भगवान ! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके रूप को नहीं जानते तब मैं अज्ञानी कैसे जान सकता हूं। आप प्रसन्न होइए, अब मैं सामर्थ्य के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मेरी रक्षा करो और पहले के समान नौका में धन भर दो। साधु वैश्य के भक्तिपूर्वक वचन सुनकर भगवान प्रसन्न हो गए और उसकी इच्छानुसार वरदान देकर अन्तर्धान हो गए। ससुर-जमाई जब नाव पर आए तो नाव धन से भरी हुई थी फिर वहीं अपने अन्य साथियों के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपने नगर को चल दिए। जब नगर के नजदीक पहुंचे तो दूत को घर पर खबर करने के लिए भेज दिया। दूत साधु की पत्नी को प्रणाम कर कहता है कि मालिक अपने दामाद सहित नगर के निकट आ गए हैं। दूत की बात सुन साधु की पत्नी लीलावती ने बड़े हर्ष के साथ सत्यनारायण भगवान का पूजन कर अपनी पुत्री कलावती से कहा कि मैं अपने पति के दर्शन को जाती हूं तू कार्य पूर्ण कर शीघ्र आ जा! माता के ऎसे वचन सुन कलावती जल्दी में प्रसाद छोड़ अपने पति के पास चली गई। प्रसाद की अवज्ञा के कारण श्रीसत्यनारायण भगवान रुष्ट हो गए और नाव सहित उसके पति को पानी में डुबो दिया। कलावती अपने पति को वहां ना पाकर रोती हुई जमीन पर गिर गई।
नौका को डूबा हुआ देख व कन्या को रोता देख साधु दुखी होकर बोला कि हे प्रभु - मुझसे तथा मेरे परिवार से जो भूल हुई है उसे क्षमा करें।साधु के दीन वचन सुनकर श्रीसत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए और आकाशवाणी हुई: हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है इसलिए उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि वह घर जाकर प्रसाद खाकर लौटती है तो इसे इसका पति अवश्य मिलेगा। ऐसी आकाशवाणी सुन कलावती घर पहुंचकर प्रसाद खाती है और फिर आकर अपने पति के दर्शन करती है। उसके बाद साधु अपने बंधु-बाँधवों सहित श्रीसत्यनारायण भगवान का विधि-विधान से पूजन करता है। इस लोक का सुख भोग वह अंत में स्वर्ग जाता है।
॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चौथा अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का 5वां अध्याय
सूतजी बोले, हे ऋषियों ! मैं और भी एक कथा कहता हूं, प्रजापालन में लीन तुंगध्वज नाम का एक राजा था। उसने भी भगवान का प्रसाद त्याग कर बहुत दुख को पाया। एक बार वन में जाकर वन्य पशुओं को मारकर वह बड़ के पेड़ के नीचे आया। वहां उसने ग्वालों को भक्ति-भाव से अपने बंधुओं सहित सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा। अभिमानवश राजा ना वहां गया और ना ही नमस्कार किया। ग्वालों ने राजा को प्रसाद दिया लेकिन उसने वह प्रसाद नहीं खाया और प्रसाद को वहीं छोड़ वह अपने नगर को चला गया। जब वह नगर में पहुंचा तो वहां सबकुछ तहस-नहस हुआ पाया तो वह शीघ्र ही समझ गया कि यह सब भगवान ने ही किया है। वह दुबारा ग्वालों के पास पहुंचा और विधि पूर्वक पूजा कर के प्रसाद खाया तो श्रीसत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा हो गया। दीर्घकाल तक सुख भोगने के बाद अंत में स्वर्गलोक को गया। सूतजी बोले, जिन्होंने पहले इस व्रत को किया है अब उनके दूसरे जन्म की कथा कहता हूं। वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने सुदामा का जन्म लेकर मोक्ष को पाया। लकड़हारे ने अगले लेकर निषाद बनकर मोक्ष पाया। उल्कामुख नाम का राजा दशरथ होकर बैकुंठ को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र को आरे से चीरकर मोक्ष पाया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू होकर भगवान में भक्तियुक्त हो कर्म कर मोक्ष पाया।जो मनुष्य इस व्रत को करेगा तो भगवान सत्यनारायण की कृपा उसे धन-धान्य की प्राप्ति होगी। निर्धन धनी हो जाता है, बंधी बंधन से मुक्त हो जाता है। संतान हीन को संतान मिलती है और सारे मनोरथ पूर्ण होने पर मानव अंतकाल में बैकुंठधाम को जाता है। इस तरह कथा पढ़ने के बाद श्रीहरि का पूजन कर भोग लगाकर सभी को प्रसाद बांटें।
बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय।
लेखक के बारे में
Anuradha Pandeyशार्ट बायो
अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।
परिचय और अनुभव
अनुराधा पांडे पत्रकारिता जगत का एक अनुभवी चेहरा हैं, जिन्हें मीडिया में 16 वर्षों का व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और संस्थान के एस्ट्रोलॉजी और करियर सेक्शन की इंचार्ज हैं। अनुराधा पिछले 10 सालों से लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में लिख रही हैं। डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उन्होंने धर्म जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी से करोड़ों पाठकों का भरोसा जीता है। उनके पास खबरों को न केवल प्रस्तुत करने, बल्कि सरल जानकारी, संतुलित सलाह, भरोसेमंद और विश्लेषणात्मक कंटेंट देने का लंबा अनुभव है। वह शिव महापुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और कई अन्य शास्त्रों के जटिल तथ्यों को अपने शब्दों में लिखकर पाठकों तक पहुंचाती हैं।
शैक्षणिक योग्यता और पेशेवर सफर
अनुराधा ने अपने करियर की शुरुआत साल 2010 में आज समाज अखबार से की। इसके बाद उन्होंने 'आज तक' (Aaj Tak) में एजुकेशन सेक्शन में तीन साल तक अपनी सेवाएं दीं। साल 2015 से वह लाइव हिन्दुस्तान से जुड़ी हैं और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रही हैं। उनका गहरा अनुभव उन्हें जटिल विषयों पर सरल और प्रभावी ढंग से लिखने में सक्षम बनाता है। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है। इसके साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन, सीसीएसयू से एम.कॉम और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एवं मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है।
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अनुराधा का उद्देश्य एस्ट्रोलॉजी (धर्म) के माध्यम से राशियों पर ग्रहों के प्रभाव, कुंडली, ग्रहों की स्थिति, नक्षत्र, भाव और दशा-विश्लेषण को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना है। ग्रहों का व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर क्या असर पड़ता है, इन जटिल ज्योतिषीय अवधारणाओं को आम पाठकों के लिए सुलभ बनाना उनकी प्राथमिकता है। इसके साथ ही टीम का कुशल मार्गदर्शन और कंटेंट की क्वालिटी सुनिश्चित करना भी उनके विजन का अहम हिस्सा है।
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विशेषज्ञता
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ग्रह नक्षत्रों का लोगों पर असर
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ग्रहों की स्थिति और राशियां


