
सफला एकादशी व्रत कब है? नोट कर लें डेट, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, सामग्री लिस्ट
हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत करने का भी विशेष महत्व होता है। हर माह में 2 बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है।
हिंदू धर्म में एकादशी का बहुत अधिक महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत करने का भी विशेष महत्व होता है। हर माह में 2 बार एकादशी तिथि पड़ती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत को करने से घर में सुख-शांति बढ़ती है और जीवन में स्थिरता आती है।

सफला एकादशी 2025 डेट- वैदिक पंचांग के मुताबिक सफला एकादशी की तिथि 14 दिसंबर रात 8:46 बजे शुरू होगी और 15 दिसंबर रात 10:09 बजे खत्म होगी। उदयातिथि के अनुसार व्रत 15 दिसंबर 2025 को रखा जाएगा और पारण 16 दिसंबर को किया जाएगा।
सफला एकादशी पारण का समय- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि पर पारण किया जाता है। 16 दिसंबर को पारण का शुभ समय: सुबह 6:55 बजे से 9:03 बजे तक है।
इस दिन दान का महत्व- एकादशी के दिन दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त भगवान विष्णु की पूजा करने के बाद मंदिर, गरीबों या जरूरतमंदों में भोजन, कपड़े और धन का दान करते हैं। मान्यता है कि एकादशी के दिन किया गया दान कई गुना फल देता है।
सफला एकादशी पूजा सामग्री की लिस्ट-
दीपक
पीला कपड़ा
फूल
कुमकुम
पंचमेवा
अक्षत (चावल)
फल
मिठाई
चौकी
धूप
आम के पत्ते
भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा
तुलसी के पत्ते
पूजा में पीले फूल, तुलसी और प्रसाद का विशेष महत्व माना जाता है।
पूजा विधि: इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। घर के पूजा स्थान को गंगाजल से पवित्र करने के बाद चौकी पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। दीपक जलाकर पूजा की शुरुआत करें और भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, अक्षत, पंचमेवा, फल और पीली मिठाई का भोग लगाएं। पूरे दिन सात्त्विकता बनाए रखें और फलाहार या निर्जला व्रत का पालन करें। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते रहें और शाम को फिर से दीपक जलाकर आरती करें। तुलसी पर दीप जलाकर प्रणाम करें। रात्रि में संभव हो तो भजन-कीर्तन या शांत ध्यान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में शुभ मुहूर्त के दौरान तुलसी जल ग्रहण कर व्रत का पारण करें।





