Rishi Panchami Vrat Katha: यहां पढ़ें ऋषि पंचमी व्रत की सबसे पौराणिक कथा
Rishi Panchami Vrat Katha in Hindi: हिंदू धर्म में ऋषि पंचमी व्रत का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस व्रत में कथा का पढ़ना या श्रवण करना अनिवार्य होता है। बिना व्रत कथा पढ़े या सुने व्रत के संपूर्ण फल की प्राप्ति नहीं होती है। यहां पढ़ें ऋषि पंचमी व्रत कथा।

Rishi Panchami Vrat Katha: हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। इस साल ऋषि पंचमी 15 सितंबर 2026, मंगलवार को है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से पापों से मुक्ति मिलती है और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली का आगमन होता है। मान्यता है कि इस समय महामारी के समय होने वाली भूल से भी मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि व्रत कथा के बिना संपूर्ण व्रत के फल की प्राप्ति नहीं होती है, इसलिए हर व्रती को कथा अवश्य सुननी या पढ़नी चाहिए। यहां पढ़ें ऋषि पंचमी की व्रत कथा।
ऋषि पंचमी व्रत की कथा-
एक समय की बात है विदर्भ देश में उत्तंक नामक ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नी के साथ निवास किया करता था। उस ब्राह्मण दंपत्ति के एक पुत्र और एक पुत्री थी। उसके पुत्र का नाम सुविभूषण था। वह कुशाग्र और तीक्ष्ण बुद्धि वाला था। उसने अल्प काल में ही वेदों को पढ़ लिया था। हे राजन! उत्तंक ने अपनी पत्नी की परामर्श से अपनी पुत्री का विवाह एक सुयोग्य ब्राह्मण कुमार के साथ कर दिया। किंतु भगवान की गति ही कुछ ऐसी थी कि कन्या विवाह के एक माह पश्चात ही विधवा हो गई। अत: विधवा होने के पश्चात वह क्या अपने धर्म का पालन करती हुई अपने पिता के यहां रहकर ही अपने समय को व्यतीत करने लगी। विधवा कन्या के दुख से दुखी होकर उत्तंक अपने घरबार को अपने पुत्र को सौंप कर स्त्री और कन्या को लेकर गंगा जी के किनारे चला गया। वहां आश्रम बनाकर छेदों का पठन पाठन करने लगा। उसके पास कुछ ब्राह्मण भी वेद पढ़ने के लिए रहने लगे।
शरीर में कीड़े हो गए उत्पन्न
कन्या का अपने धर्म का पालन करती हुई अपना समय व्यतीत कर रही थी। वह नित्य प्रति मन लगाकर माता पिता की सेवा करती थी। एक दिन समस्त कार्यों से थक कर वह एक शिला पर आराम करने के लिए लेट गई। थकान के कारण उसको अपने शरीर की सुधि भी नहीं रही। भगवान की गति से अर्धरात्रि के समय यकायक उसके शरीर में कीड़े उत्पन्न हो गए। शिष्यों ने जब उस कन्या के शरीर पर कीड़े पड़ जाने की बात सुनकर ब्राह्मणी कातर स्वर से विलाप करती हुई उसी शिला के पास पहुंची जहां उसकी कन्या बेसुध पड़ी थी। उसके शरीर पर कीड़ों को देखकर बहुत दुखी हुई और विलाप करते हुए ब्राह्मणी अचेत हो गई। जब उसे चेत हुआ तो उसने अपनी सोती हुई कन्या को गोदी में उठाया और अपने पति उत्तंक के सामने ले जाकर रख दिया।
कन्या की दशा को देखते हुए ब्राह्मणी ने अपने पति से कहा- हे स्वामी! आप कृपा कर मुझे यह बताएं कि मेरी इस साध्वी कन्या की दुर्दशा किस दुष्कर्म के कारण हुई है। अपनी भार्या की बातों को सुनकर उत्तंक मुनि थोड़ी देर के लिए शांत होकर भगवान का ध्यान करने लगे उन्होंने अपनी ज्ञान शक्ति के द्वारा कन्या के पूर्व जन्म के समस्त वृतान्तों को जान लिया। तब वे अपने नेत्रों को खोलकर बोले- हे प्रिय! यह कन्या अपने पहले जन्म में एक ब्राह्मणी थी। उस समय इसने रजस्वला होते हुए भी एक समय घर के घड़े आदि बर्तनों को छू लिया था । उसी पाप के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं। इसने शुद्ध होने के बाद अपनी सखियों के साथ ऋषि पंचमी व्रत को देखकर भी उसका आदर नहीं किया था। व्रत के दर्शन प्रभाव से तो इस जन्म में इसको उत्तम ब्राह्मण कुल प्राप्त हुआ लेकिन व्रत का तिरस्कार करने के कारण इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं।
व्रत की महिमा
मुनि के वचनों को सुनकर सुशीला बोली हे स्वामिन! जिस व्रत के दर्शन मात्र से आपके समान ब्रह्मतेजोमय उत्तम कुल में इसको जन्म प्राप्त हुआ और जिसका तिरस्कार करने से शरीर कीड़ों से भर गया उस महान आश्चर्यजनक व्रत को आप कृपा करके मुझे सुनाएं। उत्तंक प्रसन्न होकर बोले- हे सुशीले! वह व्रत समस्त व्रतों में उत्तम है। इसके प्रभाव से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को धारण करने वाला निश्चय ही दैहिक, भौतिक और दैविक तीनों प्रकार के कष्टों से छूट जाता है। इस व्रत को करके स्त्रियां सौभाग्य को प्राप्त करती हैं। इस महान व्रत को भादो माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को किया जाता है। इस व्रत के प्रभाव से जातक को पूर्व जन्म का स्मरण रहता है।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।


