Raksha Bandhan katha: राजा बलि की दानवीरता की कहानी से भी जुड़ी है रक्षा बंधन की कहानी

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Raksha Bandhan Kahani:ह पर्व रिश्तों की मरम्मत करने का भी पर्व है, जिसमें मतभेद, अहंकार और किसी भी प्रकार से उत्पन्न कटुता को इस दिन समाप्त करने का अवसर होता है।

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रक्षा बंधन पर सिर्फ इतने घंटे का मुहूर्त

श्रावणी पूर्णिमा के दिन रक्षा बंधन (28 अगस्त) मनाने की परंपरा भविष्य पुराण के अनुसार राजा बलि की दानवीरता की कहानी से भी जुड़ी है। उन्होंने विष्णु को अपना शरीर दान में अर्पित कर दिया और विष्णु से अपने द्वार पर दर्शन देने का वरदान प्राप्त कर लिया। यह वर देने के बाद विष्णु उनके द्वारपाल की भूमिका में आ गए। इससे दुखी होकर लक्ष्मी ने नारद की सलाह पर राजा बलि को रक्षा सूत्र बांधकर विष्णु को मुक्त कराया। तब से यह परंपरा शुरू हुई। विष्णु पुराण की कथा के अनुसार शची ने भी इंद्र को रक्षा-सूत्र बांधा था। रक्षा-सूत्र केवल भाई-बहन ही नहीं, गुरु-शिष्य, राजा-प्रजा व अन्य किसी के बीच उसके आत्मसम्मान की सुरक्षा और पवित्र-प्रेम के अर्पण हेतु बांधा जाता है।

शास्त्रों में रक्षा-सूत्र बांधने हेतु एक प्रतिज्ञा भरा श्लोक

शास्त्रों में रक्षा-सूत्र बांधने हेतु एक प्रतिज्ञा भरा श्लोक भी पढ़ा जाता है- ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि, रक्षे मा चल मा चल:।’ इस मंत्र के साथ रक्षा-सूत्र बांधने का हमारे शास्त्रों में विधान है। इसी दिन श्रावणी-उपकर्म भी किया जाता है, जिसमें आत्मशुद्धि ऋषि-सम्मान, नया जनेऊ धारण, पवित्र नदियों में स्नान, शिव-पार्वती उपासना आदि पवित्र कार्य किए जाते हैं। यह पर्व हमें आत्मबोध कराता है कि जब समाज में सम्मान, सुरक्षा और समानता होगी अर्थात धन और लिंग के आधार पर भेद-भाव नहीं होगा, तभी जाकर समाज की अभीष्ट पूर्णता होगी।

आज के युग में व्यक्ति भौतिकता के पीछे तेजी से भाग रहा है। उसे अपने करियर, व्यवसाय की चिंता के साथ समाज में आर्थिक असमानता की उठती ऊंची दीवारों और कहीं-न-कहीं सोशल मीडिया से उत्पन्न वैचारिक कटुता की वृद्धि ने काफी असहज कर रखा है। ऐसे में इस पर्व की पवित्रता और महत्व दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा है। सांस्कृतिक तौर पर इस पर्व पर स्नेह, कर्तव्य और रक्षा का एक त्रिकोण बनता है, जो भाई-बहन के बीच एक नैतिक उत्तरदायित्व की भावना, सहानुभूति, नैतिकता और व्यक्तिगत तौर पर संस्कारों का आध्यात्मिक अभ्यास करने का अवसर प्रदान करता है।

आज के व्यस्त, डिजिटल समय में जब रिश्तों की भाषा अक्सर संक्षिप्त संदेशों तक सिमट रही है, राखी हमें रुककर सोचने का अवसर देती है कि किस तरह एक छोटा-सा धागा भरोसा, जिम्मेदारी और अपनत्व जगाता है। बहनें, जो राखी बांधती हैं, वे केवल रक्षा की कामना नहीं करतीं। वे कहती हैं कि मैं भी सदा तुम्हारे साथ बराबरी से हूं और भाई का भी छोटा-सा वचन कि मैं भी सदा तुम्हारे साथ हूं, तुम्हें कभी नहीं भुलाऊंगा। मात्र इन्हीं कुछ शब्दों में परिवार की सबसे बड़ी ताकत सालभर पुनः जीवंत हो जाती है।

-प्रो. आर. एन. त्रिपाठी

Anuradha Pandey

लेखक के बारे में

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


परिचय और अनुभव

अनुराधा पांडे पत्रकारिता जगत का एक अनुभवी चेहरा हैं, जिन्हें मीडिया में 16 वर्षों का व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और संस्थान के एस्ट्रोलॉजी और करियर सेक्शन की इंचार्ज हैं। अनुराधा पिछले 10 सालों से लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में लिख रही हैं। डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उन्होंने धर्म जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी से करोड़ों पाठकों का भरोसा जीता है। उनके पास खबरों को न केवल प्रस्तुत करने, बल्कि सरल जानकारी, संतुलित सलाह, भरोसेमंद और विश्लेषणात्मक कंटेंट देने का लंबा अनुभव है। वह शिव महापुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और कई अन्य शास्त्रों के जटिल तथ्यों को अपने शब्दों में लिखकर पाठकों तक पहुंचाती हैं।


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अनुराधा ने अपने करियर की शुरुआत साल 2010 में आज समाज अखबार से की। इसके बाद उन्होंने 'आज तक' (Aaj Tak) में एजुकेशन सेक्शन में तीन साल तक अपनी सेवाएं दीं। साल 2015 से वह लाइव हिन्दुस्तान से जुड़ी हैं और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन का नेतृत्व कर रही हैं। उनका गहरा अनुभव उन्हें जटिल विषयों पर सरल और प्रभावी ढंग से लिखने में सक्षम बनाता है। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया है। इसके साथ ही दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन, सीसीएसयू से एम.कॉम और कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन एवं मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है।


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