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Premanand Maharaj: आत्मा या फिर शरीर? आखिर किसे मिलता है पाप और पुण्य का फल

Premanand Maharaj: आत्मा या फिर शरीर? आखिर किसे मिलता है पाप और पुण्य का फल

संक्षेप:

Premanand Maharaj Pravachan: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में अपने एकांतित वार्तालाप के दौरान पुण्य और पाप को लेकर चर्चा की है। नीचे विस्तार से जानें कि उन्होंने क्या कहा है?

Jan 07, 2026 04:34 pm ISTGarima Singh लाइव हिन्दुस्तान
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Premanand Maharaj Latest: वृंदावन के जाने-माने संत प्रेमानंद महाराज अपने प्रवचन के दौरान जिंदगी और मृत्यु के बीच की चीजों को बड़ी ही आसानी से समझाते हैं। जीवन से पहले की दुनिया और इसके बाद की दुनिया को लेकर उन्होंने अब तक कई बातें बताई हैं। हाल ही में अपने एकांतित वार्तालाप के दौरान उन्होंने पाप और पुण्य को लेकर चर्चा की। एक श्रद्धालु ने उनसे पूछा कि जो हमसे पाप और पुण्य होते हैं उसका फल किसे मिलता है? इस सवाल के जवाब में प्रेमानंद महाराज ने बड़ा ही प्यारा जवाब दिया। नीचे पढ़ें प्रेमानंद महाराज का जवाब...

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किसे मिलता है पुण्य-पाप का फल?

प्रेमानंद महाराज ने कहा कि पहली बात तो आत्मा और जीव दो नहीं हैं। उसी को ध्याभिमान के कारण जीव कहा गया और देव भाव रहित होने पर वही आत्म स्वरूप है। आत्म स्वरूप ही परमात्म स्वरूप है। ये मन और देह को भोगना पड़ता है। जो देह के द्वारा शुभ-अशुभ कर्म होते हैं। उनका पुण्य और पाप आत्मा निरलिप्त है। मन को भोगना होता है। देह को भोगना होता है। आत्मा को नहीं। आत्मा निरलिप्त है। निर्विकार है। हां वो देह भाव को प्राप्त हो गया है तो इसी बात की वजह से उसे सुख और दुख का अनुभव होता है। यदि ये देह भाव रहित हो जाए तो अखंड प्रसन्नता उसके अंदर है। जिसे आत्म स्वरूप का ज्ञान हो गया हो, बोध हो गया है, उसे अखंड प्रसन्नता की प्राप्ति होती है। ना कोई सोच रह जाती है ना कोई चाह रह जाती है। तो भोगना पड़ता है शरीर और मन को।

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पूर्ण समर्पण के लिए मंदिर जाना पर्याप्त?

इस सवाल के जवाब में प्रेमानंद महाराज ने कहा कि मन आए तो मंदिर चले जाओ और ना मन हो तो ना जाओ लेकिन चिंतन करो भगवान का। गलत आचरण का त्याग करो। मंदिर जाते हो और पाप करते हो। मंदिर जाते हो चोरी, नशा, हिंसा और गंदी बातें करते हो तो क्या फायदा? कुछ नहीं होगा। नरक जाओगे। कुछ नहीं होगा। अगर हमेशा नाम जप करोगे और गलत आचरण नहीं करोगे तो आपको सदगति है। मन भी तो मंदिर है। सभी के अंदर भगवान विराजमान हैं। अगर इतने नजदीक भगवान हैं। इससे ज्यादा नजदीक कोई हो ही नहीं सकता है। जब इनसे परिचय नहीं है तो बाहर वाले मंदिर में जो भगवान विराजमान हैं उनसे कैसे परिचय होगा? चिंतन करो।

Garima Singh

लेखक के बारे में

Garima Singh
गरिमा सिंह हिंदुस्तान लाइव में ज्योतिष सेक्शन में काम करती हैं। उन्हें पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव है। इससे पहले वह एंटरटेनमेंट बीट पर भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से टेलीविजन और रेडियो पत्रकारिता की पढ़ाई की है। और पढ़ें
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