अलोपी देवी मंदिर: प्रयागराज के इस मंदिर में नहीं है कोई मूर्ति, चैत्र नवरात्रि में उमड़ती है भीड़, जुड़ी है ये मान्यताएं
उत्तर प्रदेश की बात करें, तो यहां मां देवी के कई ऐसे मंदिर हैं, जहां चैत्र नवरात्रि के दौरान भक्तों का तांता लगा रहता है। एक ऐसा ही मंदिर प्रयागराज में है, जहां नवरात्रि में भक्तों की भारी संख्या में भीड़ देखी जाती है। इस मंदिर के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां माता की कोई मूर्ति नहीं है।

हिंदू धर्म में चैत्र नवरात्रि का खास महत्व होता है। यह पर्व हर साल चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। वैसे इस बार चैत्र नवरात्रि की शुरुआत 19 मार्च, दिन गुरुवार से हो रही है और इसका समापन 27 मार्च को होगी। 9 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के 9 अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। इतना ही नहीं चैत्र नवरात्रि आते ही देशभर के माता के मंदिर सजने लगते हैं। क्योंकि इस दौरान माता के दर्शन के लिए मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। उत्तर प्रदेश की बात करें, तो यहां मां देवी के कई ऐसे मंदिर हैं, जहां चैत्र नवरात्रि के दौरान भक्तों का तांता लगा रहता है। एक ऐसा ही मंदिर प्रयागराज में संगम के पास में स्थित है, जहां नवरात्रि में भक्तों की भारी संख्या में भीड़ देखी जाती है। इस मंदिर के बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां माता की कोई मूर्ति नहीं है। चलिए मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में जानते हैं।
मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर
प्रयागराज में स्थित हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं, उसका नाम अलोपी देवी मंदिर है, जो संगम के नजदीक अलोपीबाग में स्थित है। इस मंदिर को 'मां अलोपशंकरी का सिद्धपीठ मंदिर' नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथा के मुताबिक यहां मां सती के दाहिने हाथ का पंजा एक कुंड में गिरकर अदृश्य या अलोप हो गया था। इसलिए इस मंदिर को देवी अलोपशंकरी के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर मां शक्ति के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
चैत्र नवरात्रि में होती है भक्तों की भीड़
वैसे इस मंदिर में आम दिनों में भी अच्छी भीड़ देती जाती है। लेकिन, नवरात्रि का बात करें, तो नवरात्रों में यहां मां का शृंगार तो नहीं होता, परंतु उनके स्वरूपों का पाठ किया जाता है। नवरात्रि में देवी के दर्शनों के लिए भक्तजन घंटों लाइन में खड़े होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं। मंदिर में स्थित कुंड से ही जल लेकर भक्त पालने पर चढ़ाते हैं और देवी का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी परिक्रमा करते हैं।
हर सोमवार और शुक्रवार को लगता है मेला
मां शक्तिपीठ के इस मंदिर में नवरात्रि के अलावा हर सोमवार और शुक्रवार के दिन भारी संख्या में भक्त आकर माता के दर्शन करते हैं और अपनी मनोकामना के लिए प्रार्थना करते हैं। यूं कह लीजिए कि इन दो दिन मेला लगता है। भक्त पालने की पूजा तो करते ही हैं, साथ में यहां कलाई पर रक्षा-सूत्र बांध कर माता से मन्नत भी मांगते हैं।
मंदिर में कोई नहीं है मूर्ति
हालांकि मां शक्तिपीठ के इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं रखी गई है। बल्कि मंदिर प्रांगण के बीच में एक चबूतरा है जहां एक कुंड बना हुआ है। इसके ऊपर एक खास झूला या पालना है, जिसे लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है। मान्यता है कि मां सती की कलाई इसी स्थान पर गिरी थी। यह प्रसिद्ध शक्ति पीठ है और इस कुंड के जल को चमत्कारिक शक्तियों वाला माना जाता है।
पालने या झूले की होती है पूजा
आस्था के इस मंदिर में किसी मूर्ति की नहीं बल्कि इसी झूले या पालने की पूजा की जाती है। क्योंकि मान्यता है कि जहां झूला यानी पालना है, वहीं पर शिवप्रिया सती के दाहिने हाथ का पंजा गिरा था और अदृश्य या अलोप हो गया था। पुष्प, लाल चुनरी, घंटियों आदि से सुसज्जित इस पावन झूले को ही देवी का प्रतीक माना जाता है। साधक यहां मनोकामना को पूरा करने के लिए एक लाल रंग का धागा बांधता है और जब वह पूरी हो जाती है तो कोई भी एक धागा खोलकर मां को धन्यवाद देता है।
कैसे पहुंचे?
अगर आप इस मंदिर में दर्शन के लिए आना चाहते हैं, तो आप हवाई जहाज, ट्रेन, बस आदि से भी पहुंच सकते हैं। प्रयागराज में एयरपोर्ट मौजूद है जिसे बरमौली हवाई अड्डा भी कहते हैं। एयरपोर्ट से उतकर आपको टैक्सी और बसें भी मिल जाएंगी, जिससे आप मंदिर तक आसानी से पहुंच सकते हैं। अगर आप ट्रेन से आ रहे हैं, तो प्रयाराज जंक्शन से अलोपी देवी मंदिर महज 3. 5 किलोमीटर दूर पर है। वहीं, बस की बात करें, तो अलोपी देवी मंदिर से प्रयागराज बस अड्डे की कुल दूरी 4.5 किलोमीटर है। अगर आप यहां उतरते हैं तो सिंगल और शेयर्ड ऑटो या टैक्सी के जरिए मात्र 15 मिनट में अलोपी देवी मंदिर परिसर तक पहुंच जाएंगे।
डिस्क्लेमरः इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
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धीरज पाल एक डिटिजल पत्रकार है, जिन्हें इस क्षेत्र में 7 से अधिक का अनुभव है। वर्तमान में वो भारत की प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान लाइव हिंदुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन का हिस्सा हैं। यहां वह ग्रह गोचर, वास्तु शास्त्र, न्यूमरोलॉजी, रत्न शास्त्र से जुड़ी खबरें लिखते हैं।
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धीरज पाल डिजिटल मीडिया में उभरता एक ऐसा नाम है, जो पाठक को धर्म से जुड़ी खबरों को प्रमाणिक तौर पर और आमबोल चाल की भाषा परोसते हैं। वो ग्रह नक्षत्रों, वास्तु शास्त्र, अंक ज्योतिष,रत्न शास्त्र जैसे विषयों पर लेख लिखकर पाठक को उसकी अहमियत के बारे में बताते हैं। वर्तमान में वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन से जुड़े हैं और पिछले 4 सालों से काम कर रहे हैं। अपने करियर के दौरान धीरज ने समाचार, फीचर, और एक्सप्लेनर कंटेंट में काम करते हुए अब ज्योतिषीय विषयों को डिजिटल पाठकों तक पहुंचाने में विशेष पहचान बनाई है।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
धीरज ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए इन मीडिया स्टडीज और राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज से जनसंचार एवं पत्रकारिता से परास्नातक की पढ़ाई की। पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान संस्थानों से विषयों को तत्थात्मक और प्रभावी तरीके से समझने का सलीका सीखा। यहीं से उन्हें पत्रकारिता की सीढ़ी मिली।
धीरज पाल ने अपने पत्रकारिता कर की शुरुआत एपीएन न्यूज चैनल से की। इसके बाद उन्होंने लोकमत न्यूज हिंदी और एनडीटीवी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम किया। इसके बाद वो लाइव हिंदुस्तान की एस्ट्रोलॉजी टीम का हिस्सा बने। अब इनका एकमात्र उद्देश्य ज्योतिषीय जानकारी को रुचिगत, सरल, प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत करना है।
व्यक्तिगत रुचियां
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के निवासी धीरज पाल को पत्रकारिता और ज्योतिषीय अध्ययन के साथ-साथ घूमने, किताबें पढ़ने और क्रिकेट खेलने का शौक है।
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