Pradosh Vrat Katha: 10 अगस्त को सावन सोमवार प्रदोष व्रत, पढ़ें ब्राह्मणी से जुड़ी प्रदोष व्रत कथा
Pradosh Vrat Katha in hindi Sawan Katha : सोम प्रदोष व्रत विधिवत करने से वैवाहिक जीवन की मुश्किलें दूर होती हैं और मनोकामना पूर्ति का वरदान मिलता है। बिना कथा का पाठ किए मंगला गौरी व्रत अधूरा माना जाता है।

Pradosh Vrat Katha in hindi, प्रदोष व्रत कथा : इस साल सावन महीने का पहला प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ रहा है। सावन प्रदोष के दिन भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा संध्या काल में करने का विधान है। शाम से भगवान शिव को गंगाजल, दूध, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित कर पूजा-अर्चना कर सकते हैं। 10 अगस्त के दिन श्रावण, कृष्ण त्रयोदशी तिथि का व्रत रखा जाएगा। प्रदोष व्रत रखने पर प्रदोष की कथा का पाठ करना जरूरी माना गया है। अगर आप ने व्रत नहीं भी रखा है तो प्रदोष काल में प्रदोष की कथा के श्रवण से पुण्य फल की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत पर सच्चे मन और श्रद्धा से की गई आराधना से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है। आगे पढ़ें प्रदोष व्रत की कथा -
Pradosh Vrat Katha: 10 अगस्त को सावन सोमवार प्रदोष व्रत, पढ़ें ब्राह्मणी से जुड़ी प्रदोष व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई सहारा नहीं था। इसलिए वह सुबह होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। वह खुद का और अपने पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आयी। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।
एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार पसंद आ गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। वैसा ही किया गया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करने के साथ ही भगवान शंकर की पूजा-पाठ किया करती थी। प्रदोष व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के साथ फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। मान्यता है कि जैसे ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के प्रभाव से दिन बदले, वैसे ही भगवान शंकर अपने भक्तों के दिन फेरते हैं।
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