आज सावन प्रदोष और मंगला गौरी व्रत का महासंयोग! पढ़ें मंगला गौरी और प्रदोष की कथा, मुहूर्त
Pradosh Katha Mangla Gauri Kahani : शास्त्रों के अनुसार, जब प्रदोष व्रत और मंगला गौरी व्रत एक ही दिन पड़ते हैं तो अखंड सौभाग्य, और धन लाभ का वरदान मिलताहै। आगे पढ़ें मंगला गौरी और प्रदोष व्रत की कथा -

Pradosh Katha Mangla Gauri 2026: सावन के आखिरी मंगला गौरी व्रत का समापन खास संयोग के साथ होने जा रहा है। आज मंगलवार को सावन का आखिरी प्रदोष व्रत भी रखा जाएगा। मंगलवार होने से इसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा और इसी दिन सावन का अंतिम मंगला गौरी व्रत भी है। ग्रंथों में इसे शिव-शक्ति की साधना का महासंयोग बताया गया है। शिव पुराण के अनुसार, इस दिन की पूजा से दरिद्रता और आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, जब प्रदोष व्रत और मंगला गौरी व्रत एक ही दिन पड़ते हैं तो इसे सोने पर सुहागा जैसा माना जाता है, अखंड सौभाग्य, पति की दीर्घायु और दांपत्य सुख के लिए यह दिन विशेष फलदायी है। आगे पढ़ें मंगला गौरी और प्रदोष व्रत की कथा-
पंचांग अनुसार, सावन शुक्ल पक्ष त्रयोदशी 25 अगस्त की सुबह 6:20 मिनट पर शुरू होगी और 26 अगस्त की सुबह 7:59 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर व्रत 25 अगस्त को किया जाएगा। इसी दिन सावन शुक्ल पक्ष की द्वादशी भी सुबह 6:20 तक रहेगी। इसलिए मंगला गौरी की पूजा सुबह के समय की जाएगी।
प्रदोष व्रत की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसका अब कोई सहारा नहीं था। इसलिए वह सुबह होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। वह खुद का और अपने पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन ब्राह्मणी घर लौट रही थी तो उसे एक लड़का घायल अवस्था में कराहता हुआ मिला। ब्राह्मणी दयावश उसे अपने घर ले आयी। वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य पर नियंत्रण कर लिया था इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा।
एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा तो वह उस पर मोहित हो गई। अगले दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। उन्हें भी राजकुमार पसंद आ गया। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए। वैसा ही किया गया। ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करने के साथ ही भगवान शंकर की पूजा-पाठ किया करती थी। प्रदोष व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को खदेड़ दिया और पिता के साथ फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। मान्यता है कि जैसे ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के प्रभाव से दिन बदले, वैसे ही भगवान शंकर अपने भक्तों के दिन फेरते हैं।
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है। एक नगर में धर्मपाल नाम का सेठ अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, परंतु संतान न होने के कारण उनका जीवन अधूरा लगता था। दोनों पति-पत्नी प्रतिदिन देवी-देवताओं की पूजा करते और संतान प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते। एक दिन एक साधु उनके द्वार पर भिक्षा मांगने आए। सेठानी ने बड़े आदर से उनका स्वागत किया, लेकिन साधु ने कहा कि उनके भाग्य में संतान का सुख नहीं है। यह सुनकर दोनों बहुत दुखी हुए और साधु के चरणों में गिरकर उपाय पूछने लगे।
साधु ने उन्हें मां मंगला गौरी का व्रत करने को कहा। उन्होंने कहा, श्रद्धा, संयम और पूर्ण विश्वास के साथ मां मंगला गौरी का व्रत करने से देवी अवश्य प्रसन्न होंगी। पति-पत्नी ने पूरी निष्ठा से श्रावण मास के प्रत्येक मंगलवार को व्रत रखना शुरू किया। वे प्रातः स्नान करके मां गौरी की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाते, लाल पुष्प अर्पित करते, सुहाग का श्रृंगार समान अर्पित करें और विधि-विधान से पूजा करें। वे निर्धनों को भोजन कराते तथा यथाशक्ति दान भी देते।
कुछ समय बाद मां मंगला गौरी उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं। देवी ने सपने में दर्शन देकर आशीर्वाद दिया कि शीघ्र ही उनके घर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म होगा। कुछ ही समय में उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। पूरे नगर में आनंद का वातावरण छा गया। सभी ने इसे मां मंगला गौरी की कृपा माना। जब पुत्र बड़ा हुआ तो उसका विवाह एक सुशील कन्या से हुआ। विवाह के बाद एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि युवक के जीवन पर अल्पायु का संकट है। यह सुनकर परिवार चिंतित हो गया, परंतु उसकी पत्नी ने साहस नहीं खोया। उसने पूरे विश्वास के साथ मां मंगला गौरी का व्रत करना प्रारंभ किया और हर मंगलवार देवी से अपने पति की दीर्घायु की प्रार्थना करती रही।
एक रात जब पति पर संकट आने वाला था, तब मां मंगला गौरी ने सपने में बहू को संकेत दिया कि वह सावधानी बरते। देवी की कृपा से संकट टल गया और युवक का जीवन सुरक्षित बच गया। परिवार ने इसे मां की असीम कृपा माना। मान्यता है कि जो श्रद्धापूर्वक मंगला गौरी व्रत करता है, व्रत कथा का श्रवण करता है और मां की आराधना करता है, उसके वैवाहिक जीवन में सुख बना रहता है। परिवार पर आने वाले संकट दूर होते हैं और मां मंगला गौरी की कृपा सदैव बनी रहती है।
25 अगस्त पर पूजा के शुभ मुहूर्त
ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:27 से 05:11 तक
त्रिपुष्कर योग: सुबह 05:55 से 06:20 तक
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:57 से दोपहर 12:49 तक
विजय मुहूर्त: दोपहर 02:32 से 03:24 तक
गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:51 से 07:13 तक
रवि योग: रात 10:51 से अगली सुबह 05:56 तक
मंगला गौरी व्रत पूजा का बेस्ट मुहूर्त
मां मंगला गौरी की पूजा दिन में की जाती है। इसका शुभ समय सुबह 09:09 से दोपहर 02:03 तक रहेगा।
भौम प्रदोष व्रत पर पूजा का बेस्ट मुहूर्त
प्रदोष व्रत की पूजा विशेष रूप से प्रदोष काल में होती है। कल प्रदोष काल का शुभ मुहूर्त शाम 6:51 मिनट से रात 9:04 मिनट तक रहेगा।
मंगला गौरी और प्रदोष व्रत विधि
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लाल, पीले या हरे वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थल की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर कलश स्थापना करें और मां गौरी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- मां पार्वती को हल्दी, कुमकुम, चूड़ी, बिंदी, वस्त्र और 16 श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
- मंगला गौरी व्रत और प्रदोष व्रत का संकल्प लें।
- घी का दीपक जलाकर व्रत कथा सुनें और आरती करें।
- शाम में प्रदोष व्रत की पूजा करें
- प्रदोष की कथा का पाठ करें और आरती करें।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।


