मां पाटेश्वरी मंदिर: उत्तर प्रदेश के इस शक्तिपीठ में गिरा था माता सती का स्कंध, चैत्र नवरात्रि में लगता है भव्य मेला
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में स्थित देवीपाटन शक्तिपीठ में एक महीने का विशाल मेला लगने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यह शक्तिपीठ अपनी प्राचीनता, आध्यात्मिक महत्ता और ऐतिहासिक कथाओं के लिए काफी मशहूर है।

चैत्र नवरात्रि 2026 में 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक चलेगी। इस पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में स्थित देवीपाटन शक्तिपीठ में एक महीने का विशाल मेला लगने की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। मंदिर परिसर में मेले का माहौल बनने लगा है। नवरात्रि के अलावा पूरे साल लाखों श्रद्धालु मां पाटेश्वरी के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं। यह शक्तिपीठ अपनी प्राचीनता, आध्यात्मिक महत्ता और ऐतिहासिक कथाओं के लिए काफी मशहूर है। आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में विस्तार से।
चैत्र नवरात्रि में लगने वाला प्राचीन मेला
चैत्र नवरात्रि के पहले दिन से ही मंदिर परिसर में मेला सजना शुरू हो जाता है। यह मेला एक महीने तक चलता है। इस मेले को राजकीय मेले का दर्जा प्राप्त है। बता दें कि इंडो-नेपाल सीमा के निकट होने के कारण इस मेले में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त रहते हैं।
देवीपाटन शक्तिपीठ का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
51 शक्तिपीठों में शुमार देवीपाटन शक्तिपीठ में माता सती का वाम स्कंध पट सहित गिरा था। पट सहित गिरने के कारण यहां मां को पाटेश्वरी के नाम से पूजा जाता है और इसी नाम पर क्षेत्र और मंडल का नाम देवीपाटन पड़ा। मंदिर तुलसीपुर तहसील के पाटन गांव में सूर्या (सिरिया) नदी के तट पर स्थित है। यहां महाभारत काल से सूर्यकुंड, त्रेतायुग से जलता अखंड धूना और अखंड ज्योति मौजूद है। मान्यता है कि सिद्ध रत्ननाथ (नेपाल) और गुरु गोरखनाथ को यहां सिद्धि प्राप्त हुई थी। यह स्थान ऋषि-मुनियों के तप और वैराग्य का साक्षी रहा है।
सूर्य कुंड का है महाभारत काल से संबंध
मंदिर परिसर के उत्तर दिशा में स्थित सूर्य कुंड एक प्राचीन और पवित्र जलाशय है। मान्यता है कि महाभारत काल में सूर्यपुत्र कर्ण ने इसी कुंड में स्नान किया था। कर्ण यहां प्रतिदिन स्नान कर भगवान सूर्य को अर्घ्य देते और सूर्य से दिव्यास्त्रों की दीक्षा प्राप्त करते थे। इसी कारण इस कुंड का नाम सूर्य कुंड पड़ा। कहा जाता है कि रविवार को इस कुंड में स्नान करने और षोडशोपचार पूजन करने से कुष्ठ रोग सहित विभिन्न व्याधियां दूर होती हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि कुंड में सूर्य देव की विशेष कृपा है। आज भी हजारों भक्त यहां स्नान कर आशीर्वाद लेते हैं।
मंदिर परिसर में अखंड धूना
मंदिर परिसर में अखंड धूना त्रेतायुग से लगातार जल रही है। यह धूना कभी नहीं बुझती और सदियों से प्रज्ज्वलित है। मान्यता है कि इस धूने में मां दुर्गा की शक्तियां निवास करती हैं। इस धूने की भस्म लगाने से सभी परेशानियां दूर होने और रोग निवारण की कामना करते हैं। बता दें कि यह अखंड धूना मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा का मुख्य केंद्र है।
देवीपाटन मंदिर में अखंड ज्योति
मंदिर के गर्भगृह में पातालगामिनी सुरंग है। कहा जाता है कि यहां त्रेतायुग से अखंड ज्योति जल रही है। यह ज्योति कभी नहीं बुझती है। इस ज्योति में मां दुर्गा स्वयं शक्ति स्वरूप में विराजमान हैं। भक्तों का विश्वास है कि ज्योति के दर्शन से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में प्रकाश आता है। यह ज्योति मंदिर की अनंत शक्ति और अमरता का प्रतीक है।
पूरे साल श्रद्धालुओं का तांता, चैत्र में चरम पर उत्साह
देवीपाटन मंदिर में 12 महीने देश-विदेश से श्रद्धालु आते रहते हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष उत्सव और मेला लगता है। चैत्र नवरात्रि में लाखों भक्त मां के दर्शन के लिए आते हैं। नेपाल सीमा से सटे होने के कारण नेपाल से भी बड़ी संख्या में भक्त आते हैं। मां पाटेश्वरी के नाम से ही पूरा क्षेत्र विख्यात है। भक्तों की श्रद्धा है कि यहां मां दुर्गा की समस्त शक्तियां विराजमान हैं।
मां पाटेश्वरी की कृपा और मेले का आध्यात्मिक महत्व
मां पाटेश्वरी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। चैत्र नवरात्रि में मेला केवल व्यापार और मनोरंजन का केंद्र नहीं, बल्कि आस्था और श्रद्धा का महासागर है। यहां आने वाला हर भक्त मां के आशीर्वाद से सुख, शांति और समृद्धि की कामना करता है। मंदिर की प्राचीनता और ऐतिहासिकता इसे उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक बनाती है।
चैत्र नवरात्रि 2026 में देवीपाटन शक्तिपीठ का यह मेला लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र बनेगा। अगर आप भी मां पाटेश्वरी के दर्शन और यहां की आध्यात्मिक शक्तियों का अनुभव करना चाहते हैं, तो यहां जरूर पहुंचें।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों के पूर्णतया सत्य एवं सटीक होने का हम दावा नहीं करते हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
लेखक के बारे में
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