Nirjala ekadashi Vrat Katha:निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें, 100 पीढ़ियां भी श्रीहरि के धाम में पहुंचती हैं इस व्रत से

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Nirjala ekadashi Vrat Katha: निर्जला एकादशी का व्रत कर रहे हैं तो इस व्रत में भीमसेनी एकादशी व्रत की कथा जरूर पढ़ें, इसके बिना व्रत नहीं होता है पूरा

Nirjala ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर ने व्यासजी से कहा- ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, इसका नाम क्या है और इस दिन कैसे व्रत करना चाहिए। लेकिन भीम ने कहा मुझसे एकादशी व्रत नहीं होता है। क्या आप मुझे कोई ऐसा उपाय बता सकते हैं कि व्रत भी हो जाए और मुझे भूखा भी ना रहना पड़े। भीमसेन की बात सुनकर व्यासजीने कहा यदि तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और नरक को दूषित समझते हो तो दोनों पक्षों की एकादशीको भोजन न करना । भीमसेन बोले-मैं आपके सामने सच्ची बात कहता हूं एक बार भोजन करके भी मुझसे ब्रत नहीं किया जा सकता। फिर उपवास करके तो मैं रह ही कैसे सकता हूं। मेरे उदरमें भूख नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, जो तभी शांत होती है जब मैं अधिक से अधिक खाना खाता हूं। इसलिए महामुने, मैं सिर्फ साल में केवल एक ही उपवास कर सकता हूं. जिससे स्वर्गकी प्राप्ति सुलभ हो और जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूं, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइए।

एक साल में जितनी एकादशियां होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के एक व्रत से मनुष्य प्राप्त कर लेता है। इस तनिक भी सन्देह नहीं है।इस एकादशी पर जो निर्जल व्रत करता है वह पुण्य का भागी होता है। लेकिन जो मनुष्य एकादशीके दिन अन्न खाता है, वह पाप भोजन करता है।

पुरुषों के लिए जो विशेष दान ओर कर्तव्य बताए गए हैं, इस एकादशी में उनके बारे में भी आपको जानना चाहिए। इस दिन श्रीहरि जो जल में शयन करते हैं, उन्हें जलमयी धेनु का दान करना चाहिए, इससे पहले उनका पूजन करें। इसके बाद पर्याप्त दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंको संतुष्ट करना चाहिए। जिन्होंने शम, दम ओर दान में तीनों तरह से श्रीहरिकी पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशीका ब्रत किया है, उन्होंने अपने ना सिर्फ अपनी पीढ़ी को बल्कि अपने साथ बीती हुई सो पीढ़ियों की और आनेवाली सौ पीढ़ियों को भगवान्‌ वासुदेव के परम धाम में पहुंचा दिया है। निर्जला एकादशीके दिन अन्न, वस्त्र, गो, जल, शय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु और छाता दान भी दान करना चाहिए।

इस दिन जूता दान करना चाहिए, ऐसा कहा जाता है कि जो जूता दान करता है वो सोनेके विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में जाता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता तथा जो भक्तिपूर्वक उसका वर्णन करता है, वे दोनों स्वर्गलोकमें जाते हैं। आपको बता दें कि चतुर्दशीयुक्त अमावास्या को सूर्यग्रहण के समय अगर आप पितरों का श्राद्ध करते हैं, तो भी आपको उतना फल नहीं मिलता है, जो इस कथा के सुनने से होता है । पहले इसके लिए दांत साफ करके और स्नान करके यह नियम लेना चाहिए कि मैं भगवान श्रीहरि की प्रसन्नतां के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमनके सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुंगा ।द्वादशी को गन्ध, धूप, पुष्प ओर कपड़े विधिपूर्वक पूजन करके जल का घड़ा संकल्प करते हुए दान करें।

मैं उसका यथोचित रूपसे पालन करूंगा। व्यासजी ने कहा-भीम ! ज्येष्ठ मासमें सूर्य वृष राशिपर हों या मिथुन राशि पर शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यलपूर्वक निर्जल ब्रत करो । केवल कुल्ला या आचमन करनेके लिए मुखमें जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर ओर किसी प्रकार का जल मुख में ना डालें। यह व्रत का नियम है। एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक आपको जल का त्याग करना है। यह ब्रत पूर्ण होता है। इसके बाद द्वादशी को निर्मल प्रभातकालमें स्रान करके ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक जल और सुवर्णका दान करे।

उन्होनें कहा कि भीमसेनज्येष्ट मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल ब्रत करना चाहिए । शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए । ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान्‌ विष्णु के समीप पहुंचता है । इसके बाद द्वादशी एकादशी व्रत का पारण करना चाहिए, इस दिन ब्राह्मणभोजन करानेके बाद स्वयं भोजन कंरे । जो इस प्रकार पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। यह सुनकर भीमसेनने भी इस शुभ एकादशी का ब्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पाण्डवद्वादशी के नामसे विख्यात हुई।

Anuradha Pandey

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


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