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निर्जला एकादशी में भूलकर भी न करें ये काम, व्रत हो जाएगा भंग

  • निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। ज्येष्ठमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी नाम से प्रसिद्ध है। दूसरी एकादशी व्रतों में फलाहार किया जाता है, लेकिन इस एकादशी को फल तो क्या जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है।

nirjala ekadashi 2024
Yogesh Joshi नई दिल्ली, एजेंसी/लाइव हिन्दुस्तान टीमTue, 18 June 2024 12:43 AM
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सनातन धर्म में अनेक पर बहुत त्यौहार बनाए जाते हैं सनातन धर्म को मानने वाले लोग कई प्रकार के व्रत भी करते हैं इनमें एकादशी का व्रत अत्यंत लाभकारी एवं पुण्यदायक बताया गया है।नैमिष आचार्य पंडित सदानंद द्विवेदी ने बताया कि इस बार निर्जला एकादशी का व्रत मंगलवार 18 जून को है। वर्ष की यह सबसे कठिन और अनंत पुण्य फल देने वाली एकादशी है। ज्योतिष के मुताबिक एकादशी तिथि 17 जून सुबह 4:43 पर शुरू हो रही है। इसका समापन 18 जून सुबह 6:24 पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 18 जून को निर्जला एकादशी व्रत रखा जाएगा। ज्योतिषाचार्य पंडित मुकेश मिश्रा ने बताया कि इस बार निर्जला एकादशी पर तीन मंगलकारी संयोग बन रहे रहे हैं। इस दिन त्रिपुष्कर योग, शिव योग और स्वाति नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। यह संयोग समृद्धि में वृद्धि के कारक माने जाते हैं। 

निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को किया जाता है। ज्येष्ठमास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी नाम से प्रसिद्ध है। दूसरी एकादशी व्रतों में फलाहार किया जाता है, लेकिन इस एकादशी को फल तो क्या जल भी ग्रहण नहीं किया जाता है। इस एकादशी को ग्रीष्म ऋतु में बड़े कष्ट और तपस्या से की जाती है। अतः अन्य एकादशी से इसका महत्त्व सर्वोपरि है। इस एकादशी के करने से आयु और आरोग्य की वृद्धि तथा उत्तम लोको की प्राप्ति होती है। महाभारत के अनुसार अधिमास सहित एक वर्ष की छब्बीसों एकादशी न की जा सके तो केवल निर्जला एकादशी का व्रत कर लेने से पूरा फल प्राप्त हो जाता है। निर्जला व्रत करने वाले को अपवित्र अवस्था में आचमन के सिवा बिंदुमात्र भी जल ग्रहण नही करना चाहिए। यदि किसी प्रकार जल उपयोग में ले लिया जाए तो व्रत भंग हो जाता है। निर्जला एकादशी को सम्पूर्ण दिन रात निर्जल व्रत रहकर द्वादशी को प्रातः स्नान करना चाहिए तथा सामर्थ्य के अनुसार सुवर्ण और जलयुक्त कलश का दान करना चाहिए इसके अनंतर व्रत का पारण कर प्रसाद ग्रहण करना चाहिए।

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