
मंगल के गोचर से पहले जान लें मंगल के बारे में
मंगल का गोचर 16 जनवरी को होगा। मंगल धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। मंगल के गोचर से पहले जान लें, कैसे मंगल अशुभ प्रभाव में संकेत देता है और शुभ मंगल हो तो आपके साथ क्या होता है।
मंगल का गोचर 16 जनवरी को होगा। मंगल धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे। मंगल के गोचर से पहले जान लें, कैसे मंगल अशुभ प्रभाव में संकेत देता है और शुभ मंगल हो तो आपके साथ क्या होता है। मंगल शब्द कल्याण वाचक है। शुभ क्षेम कुशल, समृद्धि, सौभाग्य, आनंद प्रसाद का इससे बोध होता है, किंतु मंगल ग्रह अमंगल रूप भी है। यह पापी और क्रूर ग्रह है। नवग्रहों में यह सेनापति है। पाप ग्रहों की श्रेणी में इसे महापापी माना जाता है। यह नए-नए पाप कराता है। लड़ाई-झगड़ा, विप्लव, ध्वंस, उत्पात, अशांति का कारक यही है। फिर भी यह मंगल है, यही आश्चर्य की बात है!
मंगल के शुभ अशुभ प्रभाव
मंगल शुभ प्रभाव में दुष्टों का दलन करता है। हिंसा से हिंसा पर विजय पा कर धर्म की स्थापना करता है। अशुभ प्रभाव में इसका उल्टा है। वह देवता एवं दैत्य दोनों है। शुभ होने से वह मंगल नाम से भूषित होता है। अशुभ होने से वह नरक नाम से अलंकृत है।मंगल का अर्थ है- गतियुक्त, गतिशील, गतिमान। गति जहां होती है, जिसमें होती है; निश्चय ही वहां उसमें रजोगुण होता है। अतः मंगल रजोगुणी है। मंगल प्रवृत्ति परक ग्रह है। यह ऊपर उठने नहीं देता। बीच में लटकाए रहता है। मंगल प्रधान जातक कभी शांत नहीं रहता। ऐसा जातक निष्क्रिय भी नहीं होता। अतः उसका पराभव भी नहीं होता।
मंगल कौन है
मंगल में म् व्यञ्जन भूमि (पृथ्वी) का बोधक है, इसलिए इसे भौम कहते हैं। भूमि से उत्पन्न होने के कारण अथवा भूमि तत्व से युक्त होने के कारण म् व्यञ्जन को भौम नाम दिया गया है। मंगल के दो नाम हैं- भौम और नरक। मंगल पापी है। अतः इसे पुराणों में भौमासुर/नरकासुर कहा गया है। श्रीमद्भागवत में भी नरकासुर को भूमिपुत्र (भौम) कहा गया है।
कुंडली में मंगल कैसा
कुंडली में निर्बल मंगल चोर बनाता है। बलवान मंगल चोरों का सरदार बनाता है। थोड़ा बलवान मंगल डकैत बनाता है, अधिक बलवान मंगल डकैतों का मुखिया बनाता है। हत्या, लूटपाट, छीना-झपटी, अपहरण, मंगल के सहजात गुण हैं। पौराणिक कथा के अनुसार भौम ने सोलह हजार राज कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने महल में बंद किया था।
भौम ने देवमाता अदिति के कानों का कुंडल चुरा लिया था। वरुण का छत्र छीन लिया था। वह प्राग्ज्योतिषपुर का राजा था। प्राग् का अर्थ है- पूर्व वा पहले। ज्योतिष का अर्थ है- प्रकाश व ज्ञान का होना। इस प्रकार प्राग् ज्योतिषपुर का अर्थ हुआ- ‘प्रकाश से पहले की अवस्था’ अर्थात अंधकारमय स्थान। स्पष्ट है, वह अज्ञान का अधिपति था। तात्पर्य यह कि मंगल के कारण जातक अज्ञान की ओर उन्मुख होता है।
(साभार : वैदिक ज्योतिष, भाग-1 (पूर्व सत्यवाक्) अग्नि मंदिर प्रकाशन, इलाहाबाद)





