Mahavir Swami Jayanti 2026, महावीर जयंती: स्वयं को जीतना सिखाते महावीर
Mahavir Swami Jayanti 2026 : तीर्थंकर का अर्थ है, वह आत्मा जो राह दिखाने के लिए पैदा हुई है। साधारण आत्मा तीर्थंकर नहीं हो सकती, क्योंकि जो स्वयं मार्ग खोज रहा हो, वह मार्ग नहीं दिखा सकता। मार्ग क्या है, यह मंजिल पर पहुंच कर ही पता चलता है।

Mahavir Swami Jayanti 2026 : महावीर जैसी आत्माएं अपनी यात्रा पिछले जन्म में ही पूरी कर चुकी होती हैं। इस जन्म में इस संसार में आने की प्रेरणा के पीछे उनकी अपनी कोई वासना नहीं है। सिर्फ करुणा कारण है। तीर्थंकर का अर्थ है, वह आत्मा जो राह दिखाने के लिए पैदा हुई है। साधारण आत्मा तीर्थंकर नहीं हो सकती, क्योंकि जो स्वयं मार्ग खोज रहा हो, वह मार्ग नहीं दिखा सकता। मार्ग क्या है, यह मंजिल पर पहुंच कर ही पता चलता है। मंजिल पर पहुंच जाना इतना कठिन नहीं है, जितना मंजिल पर पहुंच कर मार्ग पर वापस लौटना। ऐसी आत्माएं तीर्थंकर कहलाती हैं। तीर्थंकर का अर्थ है- वह मल्लाह, जो घाट से पार होने का रास्ता बताए।
सच में जो विशिष्ट होता है, उसका प्रारंभिक जीवन घटना शून्य होता है, इसलिए क्योंकि वह लौटा है औरों के लिए, अपने लिए नहीं। बस वह चुपचाप बढ़ता चलता जाता है। चारों तरफ चुप्पी होती है और वह बड़ा होता जाता है। उस क्षण की प्रतीक्षा में जो वह देने आया है, वह दे दे। मेरी दृष्टि में उनको वर्धमान नाम ही इसलिए मिला कि जो चुपचाप बढ़ने लगा। जिसके आस-पास कोई घटना ही नहीं घटी, यानी जिसका बढ़ना इतना चुपचाप था, जैसे पौधे चुपचाप बड़े होते हैं, कलियां फूल बनती हैं। कहीं कोई शोर नहीं होता। शिक्षक पढ़ाने आए, तो उसने मना कर दिया और शिक्षकों ने भी पाया कि जो पढ़ाया जा सकता है, वह उसे पहले से ज्ञात है।
दूसरी बात ध्यान में रख लेने जैसी है, अर्थपूर्ण है, जो मिथ, जो कहानी है, वह तो यह है कि वे ब्राह्मणी के गर्भ में थे और देवताओ ने गर्भ बदल कर क्षत्रिय गर्भ में पहुंचा दिया। मेरी नजर में महावीर का पथ जीतनेवाले का यानी क्षत्रिय का था, इसलिए वे जिन कहलाए अर्थात जीतनेवाला, इसलिए पूरी परंपरा जैन हो गई। कहानी यह कहती है कि महावीर का व्यक्तित्व ही ब्राह्मण का नहीं है, इसलिए देवताओ को गर्भ बदलना पड़ा, क्योंकि उनका व्यक्तित्व मांगने का, भिक्षा का नहीं, बल्कि जीतनेवाले का है।
महावीर अपने आप में इतने पूर्ण थे कि संन्यास के लिए भी पिता से आज्ञा मांगी। संन्यास के लिए भी कभी आज्ञाएं दी गई हैं? जैसे कोई आत्महत्या के लिए अनुमति मांगे, क्या इसके लिए भी कोई पिता आज्ञा देगा, यह बहुत अद्भुत बात है। संन्यास का तो अर्थ ही है कि जिसने मोह-बंधन त्याग दिए पर महावीर ने आज्ञा मांगी। इससे भी अद्भुत बात यह हुई कि पिता ने कहा, ‘मेरे जीवित रहते, तो तुम संन्यास नहीं लोगे।’
महावीर राजी भी हो गए। यानी वे स्वयं में इतने पूर्ण थे कि तन संन्यासी न भी रहे, तो मन से थे, इसलिए पिता के मरने तक संन्यास नहीं लिया। पिता के अंतिम संस्कार से लौटते हुए रास्ते में ही अपने भाई से संन्यास की आज्ञा मांगी। भाई ने भी आज्ञा नहीं दी और महावीर फिर रुक गए। फिर महावीर तो जैसे भवन में थे ही नहीं, केवल तन ही था, इसलिए कुटुंब ने उन्हें जाने की इजाजत दे दी।
महावीर का मार्ग समर्पण का नहीं, बल्कि अकेले ही अंतरात्मा के युद्ध को जीतने का है। स्वयं को जीत कर स्वयं का स्वामी हो जाने का मार्ग है।
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