अपने दुखों के असली कारणों को पहचाने और उन्हें दूर करें
sadness:मनुष्य के दुखी व परेशान रहने के मूल कारण तीन ही है- अज्ञान अर्थात नासमझी, अशक्ति अर्थात दुर्बलता और अभाव या दरिद्रता।

मनुष्य का असली रूप आनंद भरा है। आनंदमग्न रहना ही उसका प्रधान गुण है। दुख के हटते और मिटते ही वह मूल स्वरूप में पहुंच जाता है। मनुष्य भी स्वर्ग के देवताओं की तरह आनंदित रह सकता है, यदि उसके कष्ट के कारणों का समाधान हो जाए। अज्ञानता अर्थात नासमझी- इसके कारण ही व्यक्ति उलटा-पुलटा सोचता है। जो नहीं सोचना चाहिए, वह सोचता है और उलझनों में फंसकर हैरान, परेशान व दुखी रहता है। अपनी शक्ति व क्षमता का सही ज्ञान न होने के कारण ऐसे असंभव काम हाथ में लेता है, जिनमें असफलता और निराशा ही हाथ लगती है। दूसरे व्यक्ति व परिवेश की सच्चाइयों की सही जानकारी न होने के कारण झूठी आशा-अपेक्षा और कल्पनाओं में जीता है, अंततः खिन्नता और निराशा में घुटता हुआ दुखी रहता है। अपनी नासमझी के कारण ही क्षणिक सुख व लाभ के चक्कर में ऐसे काम कर बैठता है कि पीछे दुख और पश्चाताप ही हाथ लगते हैं।
परिस्थितियां
व्यक्ति को अपनी उल्टी सोच के कारण छोटी-छोटी बातें भी बड़ी दुख भरी लगती हैं। परिजन बंधुओं की मृत्यु, साथियों की भिन्न रुचि और परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव आदि स्वाभाविक हैं, किंतु अपनी अज्ञानता के कारण व्यक्ति इन्हें नकारता है और सोचता है कि मैं जैसा चाहूं, वैसा ही हो। प्रतिकूलता सामने आए ही नहीं। इस असंभव आशा के विपरीत जब घटना होती है, तो उसे भारी कष्ट होता है।
अशक्ति अर्थात दुर्बलता
मनुष्य को कदम-कदम पर घोर पीड़ा व यातना भरा जीवन जीने के लिए विवश करती है। ऐसे में व्यक्ति अपने स्वाभाविक व जन्मसिद्ध अधिकारों का भार तक अपने कंधों पर उठाने में समर्थ नहीं होता। वह अपने को अशक्त और बीमार समझने लगता है। ऐसे में उसे स्वादिष्ट भोजन, मधुर संगीत, सुंदर दृश्य, धन-दौलत व जीवन के अन्य सुख-साधन कहने लायक कोई सुख नहीं दे पाते हैं, बल्कि भार स्वरूप और दुख देने वाले ही लगते हैं।
बौद्धिक दुर्बलता
बौद्धिक दुर्बलता के कारण व्यक्ति साहित्य, दर्शन, काव्य, विज्ञान आदि के अध्ययन व चिंतन-मनन का रस नहीं ले पाता। आत्मिक निर्बलता के कारण स्वाध्याय, सत्संग, भजन-भक्ति आदि का आनंद दुर्लभ ही रह जाता है। इतना ही नहीं, कमजोरों को मिटाने के लिए प्रकृति का ‘उत्तम की रक्षा’ का सिद्धांत काम करता है। निर्बलों को मिटाने-सताने के लिए अनेक चीजें प्रकट हो जाती हैं। सर्दी जहां खिलाड़ियों को मजबूत बनाती है,वहीं कमजोर को सर्दी, निमोनिया व गठिया जैसी समस्याएं खड़ी करती हैं। कमजोर को दुख-कष्ट ही नहीं, भले तत्व भी आशाप्रद लाभ नहीं दे पाते। वहीं सबल दुख भरी चुनौतियों के बीच ही अपनी शक्ति व गुणों का विकास करता है।
साधनों के अभाव में योग्य व समर्थ व्यक्ति भी बेबस व लुंज्ज-पुंज्ज महसूस करते हैं और दुख उठाते हैं। अपनी इन पीड़ाओं या दुखों से छुटकारा पाने का एकमात्र रास्ता यही है कि हम अपने दुखों के असली कारणों को पहचाने और उन्हें दूर करें।
-डॉ. प्रणव पण्ड्या
लेखक के बारे में
Anuradha Pandeyशार्ट बायो
अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।
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