जया एकादशी व्रत पारण कब करना होगा सही? जानें टाइम और संपूर्ण पूजा विधि
माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को जया एकादशी कहा जाता है। 29 मार्च को जया एकादशी व्रत रखा जाएगा। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

Jaya Ekadashi Vrat 2026: माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को जया एकादशी कहा जाता है। 29 मार्च को जया एकादशी व्रत रखा गया। यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। इसी कारण श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखकर सच्चे मन से श्रीहरि का ध्यान करते हैं। अगर आपने भी जया एकादशी का व्रत रखा था तो व्रत खोलने यानी पारण का सही समय और विधि जानना बहुत जरूरी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गलत समय पर पारण करने से व्रत का पूरा फल नहीं मिल पाता।
जया एकादशी का पारण कब करें?- शास्त्रों के अनुसार, एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है। हालांकि, द्वादशी तिथि की पहली चौथाई अवधि को हरि वासर कहा जाता है। इस समय पारण करना वर्जित माना गया है। इसलिए हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलना शुभ होता है। द्रिक पंचांग के मुताबिक, जया एकादशी का पारण 30 जनवरी 2026, गुरुवार को किया जाएगा। इस दिन सूर्योदय सुबह करीब 7:10 बजे होगा, जबकि द्वादशी तिथि का समापन लगभग 11:09 बजे होगा। ऐसे में व्रत खोलने का सबसे शुभ समय सुबह 7:10 बजे से 9:20 बजे के बीच रहेगा। अगर कोई व्यक्ति इस समय के दौरान पारण नहीं कर पाता है, तो उसे दोपहर के बाद ही व्रत खोलना चाहिए।
जया एकादशी व्रत की पारण विधि
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत महत्व बताया गया है। पद्म पुराण, स्कंद पुराण और विष्णु पुराण में एकादशी व्रत और उसके पारण की विधि को विस्तार से समझाया गया है। शास्त्रों के अनुसार, अगर व्रत सही तरीके से न खोला जाए, तो व्रत का पूरा फल नहीं मिलता। इसलिए पारण का समय और तरीका दोनों बेहद जरूरी माने गए हैं। पुराणों के अनुसार, एकादशी व्रत के पारण के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए, ताकि तन और मन दोनों शुद्ध हो सकें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु या श्रीहरि की मूर्ति अथवा तस्वीर के सामने दीपक जलाकर पूजा करनी चाहिए। पूजा में तुलसी दल, पीले फूल, चंदन, अक्षत और फल अर्पित करना शुभ माना गया है। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 11 या 108 बार जाप करना चाहिए और व्रत के दौरान अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए भगवान से क्षमा याचना करनी चाहिए, जैसा कि पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है। इसके बाद तुलसी के पत्तों से पारण करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है। सामान्य रूप से 3, 5 या 7 तुलसी के पत्ते ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। पारण के बाद हल्का और सात्विक भोजन करना चाहिए। ध्यान रखें कि द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले अनाज का सेवन नहीं करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, अनाज का सेवन द्वादशी तिथि पूरी होने के बाद ही करना उचित और शुभ माना गया है।
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