Hindi Newsधर्म न्यूज़Janardan Temple: Here one performs his own shraddh for salvation its importance is described in Garuda and Vayu Purana
जनार्दन मंदिर : मोक्ष के लिए यहां करते हैं खुद का श्राद्ध, गरुड़ पुराण और वायु पुराण में वर्णित है महत्व

जनार्दन मंदिर : मोक्ष के लिए यहां करते हैं खुद का श्राद्ध, गरुड़ पुराण और वायु पुराण में वर्णित है महत्व

संक्षेप:

जनार्दन मंदिर में आत्मश्राद्ध यानी जीते जी खुद का पिंडदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि पहले यह मंदिर छोटा था। फिर राजा मान सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। हर वर्ष पितृपक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। 

Sep 11, 2025 08:14 am ISTAnuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान, गया जी, मनोज कुमार
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पितरों की नगरी गया जी का धार्मिक महत्व वेद-पुराणों से लेकर आधुनिक समय तक अमिट है। यहां पितृपक्ष के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए पिंडदान करने आते हैं। गया जी में लगभग 54 पिंडवेदियां हैं, लेकिन इनमें जनार्दन मंदिर की वेदी का महत्व सबसे विशेष माना जाता है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा स्थान है जहां जीवित व्यक्ति स्वयं का पिंडदान, यानी आत्मश्राद्ध, करता है।

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भस्मकूट पर्वत पर स्थित है मंदिर: जनार्दन मंदिर गया जी के भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर में स्थित है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने स्वयं यहां वेदी की स्थापना की थी। स्थानीय पुरोहितों का कहना है कि जो व्यक्ति वैराग्य धारण कर लेता है या जिसका कोई उत्तराधिकारी न हो, अथवा जो अपने जीवन के पाप कर्मों का प्रायश्चित करना चाहता हो, वह यहां आकर आत्मश्राद्ध करता है।

आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया तीन दिनों तक चलती है: आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया तीन दिनों तक चलती है। इसमें संकल्प, प्रायश्चित, तप, जप, पूजन और अंत में पिंड अर्पण की प्रक्रिया शामिल होती है। विशेष रूप से दही और चावल से बने तीन पिंड तैयार किए जाते हैं, जिन्हें भगवान जनार्दन को अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां आत्मश्राद्ध के लिए तीन दिवसीय प्रक्रिया से होकर गुजरना पड़ता है। इसमें एक जीवित इंसान खुद के लिए पिंडदान करता है। पहले वैष्णव सिद्धि का संकल्प लेना पड़ता है। पापों का प्रायश्चित करना पड़ता है। इसके बाद भगवान जनार्दन स्वामी के मंदिर में विधिवत जाप, तप और पूजन के बाद आत्मश्राद्ध किया जाता है। इस दौरान वायु पुराण में आत्मश्राद्ध के लिए वर्णित श्लोकों का जाप किया जाता है। इसके बाद दही चावल से निर्मित तीन पिंड बनाकर भगवान जनार्दन को अर्पित किए जाते हैं। गौर करने वाली बात है कि इस पिंड में तिल का प्रयोग नहीं किया जाता है।

जय मां मंगलागौरी प्रबंधकारिणी समिति के उपाध्यक्ष व पुजारी चन्द्रधर गिरी बताते हैं कि इस वेदी का महत्व स्वयं गरुड़ पुराण और वायुपुराण में वर्णित है। यहां आत्मश्राद्ध यानी जीते जी खुद का पिंडदान किया जाता है। उन्होंने बताया कि पहले यह मंदिर छोटा था। फिर राजा मान सिंह ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। हर वर्ष पितृपक्ष के दौरान यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। लोग न सिर्फ अपने पितरों का पिंडदान करते हैं, बल्कि बहुत से साधु-संत और वैरागी आत्मश्राद्ध की विशेष प्रक्रिया भी पूरी करते हैं। इस परंपरा की वजह से जनार्दन मंदिर न केवल गया जी बल्कि पूरे भारतवर्ष के धार्मिक मानचित्र पर एक अद्वितीय और दुर्लभ स्थल माना जाता है।

Anuradha Pandey

लेखक के बारे में

Anuradha Pandey
अनुराधा पांडे लाइव हिन्दुस्तान में एस्ट्रोलॉजी और करियर सेक्शन लीड कर रही हैं। इन्हें पत्रकारिता जगत में करीब डेढ़ दशक का अनुभव है। ज्योतिष और धर्म-अध्यात्म से जुड़े विषयों पर पिछले 10 सालों से लिख रही हैं। इन्होंने हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा भारतीय जनसंचार संस्थान, दिल्ली और ग्रैजुएशन दिल्ली विश्वविद्यालय से किया है। लाइव हिन्दुस्तान में करियर का लंबा हिस्सा बीता और काम करते-करते 9 साल हो गए हैं। एस्ट्रोलॉजी और करियर से जुड़ी खबरों के अलावा हेल्थ पर लिखने शौक है। इससे पहले तीन साल तक आज तक वेबसाइट में एजुकेशन सेक्शन में भी काम किया है। और पढ़ें
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