
भला करोगे तो ही अच्छा फल मिलेगा
भगवान क्षमा के सागर हैं। वह मनुष्यों को अपनी गलती को सुधारने का मौका जरूर देते हैं, परंतु मनुष्य अपने अहंकार में इतना चूर होता है कि वह सारे अवसरों को गंवा देता है। कभी-कभी वह भगवान को भी खरीदने का प्रयत्न करता है। एक प्रकार से रिश्वत देने का प्रयत्न करता है।
भगवान क्षमा के सागर हैं। वह मनुष्यों को अपनी गलती को सुधारने का मौका जरूर देते हैं, परंतु मनुष्य अपने अहंकार में इतना चूर होता है कि वह सारे अवसरों को गंवा देता है। कभी-कभी वह भगवान को भी खरीदने का प्रयत्न करता है। एक प्रकार से रिश्वत देने का प्रयत्न करता है। मनुष्य अपने अज्ञान और अंहकार में आकर यही सोचता है कि एक तरफ बुरे काम हो रहे हैं, तो दूसरी ओर वह कुछ गरीबों या भगवान के नाम पर मंदिरों में दान करके या मंदिर बनवाकर सोचता है कि भगवान उसके बुरे कर्म को माफ कर देंगे। वह सारे बुरे कर्म की भोगना से छूट जाएगा।
इस बात को समझने लिए एक उदाहरण प्रस्तुत है- मान लो हमने कोई व्यापार करने लिए किसी से पैसे उधार लिए हैं। व्यापार में मुनाफा होने पर हम सोचें कि किसी मंदिर में दान करते हैं। यह बहुत अच्छा विचार है, परंतु जिससे उधार लिया है, वह व्यक्ति जब अपना पैसा मांगने आए, तो उस वक्त हम उसे यह कह दें कि वह तो मैंने मंदिर में दान कर दिया। अब भगवान तुम्हारी उधारी चुका देंगे, तो यह कैसे संभव है? विवेक भी यही कहता है कि जिससे उधार लिया है, उसको तो पहले चुकाना पड़ेगा। जो पुण्य दान करके कमाया है, उसका फल समय आने पर मिल जाएगा। व्यक्ति के अच्छे कर्म का फल भी जमा होता जाता है, जो उसको सुख के रूप में प्राप्त होता है। बुरे कर्म का हिसाब अलग जमा होता है, जिसकी भोगना दुख के रूप में भोगनी पड़ती है।
भगवान को याद करने का फायदा यही है कि जब दुख भोगने का समय आता है, तो उस भोगना को पार करने की या उसे सहने की शक्ति मिल जाती है। हरेक व्यक्ति इतना तो जरूर जानता है कि उसने जीवन पर्यंत ऐसे कर्म नहीं किए हैं कि जब चित्रगुप्त के सामने उनके कर्मों का हिसाब होगा, तो वह नजारा अच्छा होेगा। उस समय ईश्वरीय विश्वास उस होनी की तीव्रता का आसानी से सामना कर पाता है।
निमित्त मात्र उस कर्म की भोगना कोई बीमारी या किसी परिस्थिति के रूप में आती है, लेकिन उसे पार करना आसान हो जाता है। ऐसा नहीं है कि कोई यमराज हमें ले जा कर गरम-गरम कड़ाही में डालेंगे। मनुष्यों को जो कर्म की सजा भोगनी है, वह इसी दुनिया में रह कर ही भोगनी है।
ईश्वर को क्षमा और दया का सागर कहा जाता है। उसकी क्षमा का स्वरूप है कि वह मनुष्यों को कोई-न-कोई विशेषता का वरदान देता है, जिससे मनुष्य श्रेष्ठ कर्म कर सके। अपना जीवन अच्छी तरह से व्यतीत कर पाए। कोई व्यक्ति कितना भी बुरा क्यों न हो, लेकिन अपनी विशेषता के वरदानों के प्रयोग से वह जीवन में खुशी का अनुभव करने लगता है, जिससे भोगना का कष्ट कम महसूस होता है। हमें तो सिर्फ इस विशेषता के वरदान को पहचान कर उसका उपयोग अच्छे कर्म के लिए करना है, ताकि इतना पुण्य अर्जित कर लें, जो आगे के जन्मों को संवार दे और भविष्य को भी अच्छे से अच्छा बना सके।
ब्रह्माकुमारी चक्रधारी दीदी





