
कैसे हो जीवन की यात्रा सुखमय
संक्षेप: How to make life happy: श्वास को देखे बिना शरीर को ठीक तरह से समझ नहीं सकते, देख नहीं सकते। शरीर को देखे बिना मन को नहीं देख सकते। मन को देखे बिना आभामंडल को नहीं देख सकते और आभामंडल को देखे बिना प्राण को नहीं देख सकते।
मनुष्य का पूरा जीवन ही यात्रामय है। हम प्राय: दूसरों के दिखाए रास्तों पर ही चलते हैं, लेकिन जब मनुष्य अंतर्मन की यात्रा करता है, तब यहां किसी प्रकार के कोई पदचिह्न नहीं होते। इस यात्रा पर चलने से हम सब प्रकार की आसक्ति से मुक्त हो जाते हैं।

श्वास को देखे बिना शरीर को ठीक तरह से समझ नहीं सकते, देख नहीं सकते। शरीर को देखे बिना मन को नहीं देख सकते। मन को देखे बिना आभामंडल को नहीं देख सकते और आभामंडल को देखे बिना प्राण को नहीं देख सकते।
जो हमने यात्रा प्रारंभ की है। यात्रा के लिए हमने एक मार्ग चुना है। मार्ग पर हर कोई चलता है। हम भी चलते थे और चल रहे हैं। हर मार्ग पर पदचिह्न होते हैं, किंतु आज हमने एक ऐसा मार्ग चुना है, जिसमें कोई पदचिह्न नहीं है। पदचिह्न होने का अर्थ है- अनुसरण होना। जहां अनुसरण नहीं होता, वहां कोई पदचिह्न भी नहीं होता। हमारा मार्ग बिना पदचिह्न का मार्ग है। इसमें कोई किसी का अनुसरण नहीं करता।
जैसे आया, वैसे गया
एक चिंतन आता है और उसका संस्कार बन जाता है। एक प्रवृत्ति होती है और उसका संस्कार बन जाता है। एक शब्द आता है और उसका संस्कार बन जाता है। चिंतन चला जाता है, प्रवृत्ति चली जाती है, शब्द चला जाता है, किंतु वे अपने पीछे चिह्न छोड़ जाते हैं। जो छोड़ा जाता है, उसकी आवृत्तियां होती रहती हैं। संस्कार शेष रह जाते हैं।
किंतु हमने ऐसे मार्ग पर यात्रा शुरू की है, जिसमें कोई अनुसरण नहीं है, पदचिह्न नहीं है। जब चलने वाला अपने मार्ग से आसक्त हो जाता है, तब पदचिह्न शेष रह जाते हैं, किंतु जो विरत होता है, जिसे मार्ग का कोई मोह नहीं रहता, उसके कोई पदचिह्न नहीं होते। मार्ग चलने के लिए होता है,आसक्ति के लिए नहीं होता, मोह करने के लिए नहीं होता। जो चलता है, वह चला जाता है। जो आता है, वह जाता है, पीछे कुछ भी शेष नहीं छोड़ता। ऐसा मार्ग ही उत्तम होता है।
हमने भी ऐसा ही मार्ग चुना है, जहां कोई पदचिह्न नहीं, कोई अनुसरण नहीं, कुछ भी शेष नहीं, कोई संस्कार नहीं। जैसे आया वैसे गया। न स्मृति और न संस्कार।
बड़ा प्रश्न है किसे देखें
हमने इस मार्ग पर चलने के लिए ‘दर्शन’ का संकल्प लिया है। हम देखें। आत्मा के द्वारा आत्मा को देखें। बहुत विचित्र-सा लगता है। कौन देखे? किसे देखे? बहुत बड़ा प्रश्न है, किंतु जब हमारी देखने वाली चेतना, द्रष्टा चेतना खंडित होती है, तब उसके दो खंड हो जाते हैं- एक देखने वाली चेतना और एक दृश्य। श्वास को देखो। मन को देखो। शरीर को देखो। विचार को देखो। आभामंडल को देखो। प्राण को देखो।
आप जानना चाहेंगे कि क्या श्वास आत्मा है? क्या शरीर आत्मा है? क्या मन आत्मा है? क्या आभामंडल आत्मा है? क्या प्राण आत्मा है? कुछ चिंतन करेंगे, तो पता चलेगा कि श्वास आत्मा है। शरीर आत्मा है। मन आत्मा है। आभामंडल आत्मा है। कोई अंतर नहीं रहेगा।
आत्मा का है सारा खेल
यदि शरीर आत्मा न हो, तो जीवित शरीर और मृत शरीर में कोई अंतर नहीं रहेगा। यदि मन आत्मा न हो तो मन सहित और मन रहित में कोई अंतर नहीं रहेगा। ये सब आत्मा है। आत्मा को देखने का पहला द्वार है- प्रवास। भीतर की यात्रा का पहला द्वार है- श्वास। हम बाहर-ही-बाहर देखते हैं। मन बाहर की ओर दौड़ता है। जब भीतर की यात्रा शुरू करनी होती है, तब प्रथम प्रवेश द्वार श्वास से गुजरना होता है। जब श्वास के साथ मन भीतर जाने लगता है, तब अंतर्यात्रा शुरू होती है। श्वास आत्मा है, शरीर आत्मा है, मन आत्मा है। जहां तक हम पहुंचना चाहते हैं, वहां तक इनके द्वारा ही पहुंचा जा सकता है। इसके लिए साधना बहुत जरूरी है।
स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा
श्वास का स्पर्श किए बिना, श्वास को देखे बिना शरीर को ठीक तरह से समझ नहीं सकते, देख नहीं सकते। शरीर को देखे बिना मन को नहीं देख सकते। मन को देखे बिना आभामंडल को नहीं देख सकते। आभामंडल को देखे बिना प्राण को नहीं देख सकते और प्राण को देखे बिना उस चैतन्य तक नहीं पहुंच सकते, जहां हमें पहुंचना है। यह पूरा-का-पूरा यात्रा पथ है।
हर मुद्रा एक अलग भाव
यदि आत्मा तक पहुंचना है, सूक्ष्म तत्व तक पहुंचना है, अस्तित्व तक पहुंचना है, तो इसी यात्रा पथ पर चलना होगा। इसी क्रम से चलना होगा।
आप यह मान लें कि उस परम सत्ता को, परम अस्तित्व को, चैतन्य को, जो अमूर्त है, सूक्ष्म है, हमारे चर्म-चक्षुओं का विषय नहीं है, उसे हम देख लें- यह कहना और ऐसा समझना बहुत बड़ी भ्रांति होगी।
इसका पहला अर्थ है- मन के द्वारा श्वास के स्पंदनों को देखें। इसका दूसरा अर्थ है-मन के द्वारा शरीर के प्रकंपनों को, संवेदनों को देखें। इसका तीसरा अर्थ है- विचारों को देखें। इस स्थिति तक पहुंच जाने पर आभामंडल स्पष्ट हो जाता है। अंतर्मन की इस यात्रा से हम सब प्रकार की आसक्ति से मुक्त हो जाते हैं। जब हम आसक्ति से मुक्त होते हैं, तब जीवन सुखमय होता है।





