
रंगों से भर दो जीवन की झोली, मस्ती में झूमो आई होली!
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फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली का पर्व मनाया जाता है। दो दिन मनाए जाने वाले इस पर्व में पहले दिल होलिका दहन किया जाता है। इसका संबंध भक्त प्रह्लाद की कहानी से है, जो भगवान विष्णु के भक्त थे। प्रह्लाद को मारने के लिए उनके पिता हिरण्यकश्यप ने उन्हें होलिका की गोद में बिठा दिया था, जिससे वह जिंदा अग्नि में जल जाए। लेकिन भगवान ने भक्त पर अपनी कृपा की और प्रह्लाद के लिए बनाई चिता में स्वयं होलिका जलकर मर गई। इसलिए इस दिन होलिका दहन की परंपरा भी है। इसके अगले दिन रंगों से होली खेली जाती है। इस पर्व पर बच्चे से लेकर बूढ़े तक एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर खुशियां मनाते हैं। एक तरफ जहां बड़े आशीर्वाद देते हैं, वहीं छोटे भी होली की मस्ती में रंग जते हैं। मथुरा की होली देश और विदेश में भी प्रसिद्ध है। यहां की लड्डू होली और लट्ठमार होली देखने के लिए लाखों लोग मथुरा जाते हैं। मान्यता है कि घर में सुख-शांति और समृद्धि के लिए होली की पूजा की जाती है। होली से 8 दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाते हैं, जो कि होलिका दहन तक रहते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, होलाष्टक के दौरान कोई भी मांगलिक कार्य की मनाही होती है। इसलिए होलाष्टक प्रारंभ होने के साथ ही शुभ कार्यों पर रोक लग जाती है। माना जाता है कि होली से 8 दिन पहले तक सभी ग्रहों को स्वभाव उग्र होता है। ग्रहों की स्थिति को शुभ नहीं माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, होलाष्टक की अवधि में किए गए कार्यों का फल प्राप्त नहीं होता है।
