हरतालिका तीज व्रत कथा हिंदी में यहां पढ़ें, कैसे मां पार्वती के तप से डोला था शिवजी का सिंहासन
Hartalika Teej Vrat Kahani in Hindi: हरतालिका तीज का व्रत आज 14 सितंबर को रखा जाएगा। इस दिन हरतालिका तीज पर शिव पार्वती का पूजन किया जाता है।

भाद्रपद मास की तृतीया को हरतालिका तीज का व्रत इस साल 14 सितंबर को रखा जाएगा। इस साल उदया तिथि में हरतालिका तीज व्रत रखा जाता है। हरतालिका तीज का व्रत में प्रदोष काल में पूजा की जाती है। इस दिन हस्त नक्षत्र को बहुत खास माना जाता है। हरतालिका तीज में व्रत प्रदोष काल का महत्व है। इस दिन शिव और मां पार्वती की प्रदोष काल में पूजा होती है। शिव और मां पार्वती को फूलों से सजाकर मिट्टी की मूर्ति बनाई जाती है। इसके बाद कथा पढ़ते हैं और महिलाएं निर्जला व्रत करती हैं। आइए पढ़ें इस व्रत की कथा
कथा इस प्रकार है-
भगवान शिव अपने गणों के साथ कैलाश पर्वत पर मौजूद थे। मां पार्वती भी उनके साथ थी। इसके बाद मां पार्वती ने उनसे पूछा-स्वामी मैं बहुत धन्य हुई कि मुझे आप जैसा वर मिला। लेकिन मेरी जानने की इच्छा है कि मैंने ऐसा क्या पुण्य किया था कि मुझे आप जैसा जीवनसाथी मिला। भगवान शिव अपने सभी गणों बलवान वीरभद्र , भृंगी,श्ऱंगी और नंदी के साथ दरबार में थे। माता पार्वी ने यह भी कहा कि आप तो सभी के मन की बातों को जान लेते हैं, मुझे भी यह बताने की कृपाकरें। आप अंतर्यामी हैं, मुझ दासी को बताने की कृपा करें।
मां पार्वती की बात सुनकर भगवान शंकर बोले-तुमने अति उत्तम पुण्य किए थे, जिसके बारे में आज तुमको ही नहीं सभी को बताना चाहता हूं। वह दिन भादो मास के शुक्ल पक्ष की तीज का दिन था। इस दिन चंद्रमा, नवग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में साम, इंद्रियों में मन होता है, इस दिन इतने अच्छे संयोग थे। ऐसा सुनकर मां पार्वती और भी जानना चाहती थी कि ऐसा क्या था उस दिन तो वे बोली स्वामी -कृपा कर विस्तार से बताएं कि मैंने कब और कैसे तीज का व्रत किया। तब शंकर जी बोले- उमा-भारतमें हिमाचल श्रेष्ठ पर्वत है, उसके राजा हिमाचल हैं, तुम उन्ही हिमाचल के राजा की बेटी थीं। तुमने बाल्यकाल से ही मेरी अराधना शुरू कर दी थी। कुछ उम्र बढ़ने पर तुमने सहेली के साथ जाकर हिमालय की गुफाओं में मुझे पाने के लिए तप किया।
तुमने गर्मी में, बारिश में बाहर चट्टानों में आसन लगाकर तप किया, सर्दी में भी तुम तपस्या ही कर रही थीं। तप के समय तुमने ना तो पानी पिया और ना ही हवा ली, पेड़ों के पत्ते खाएं और तुम्हारा शरीर कमजोर हो गया। तुम्हें देखकर हिमाचल को बहुत चिंता हुई, वे तुम्हारे जल्द से जल्द विवाह की सोचने लग गए। तब वहां पर नारद देव आए। राजा ने उनका स्वागत किया और उनके आने का कारण पूछा। तब नारद जी ने कहा कि राजन मैं भगवान विष्णु का रिश्ता आपकी कन्या के लिए लेकर आया हूं। उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूं कि आपकी सुंदर कन्या को योग्य वर प्राप्त हो, सो बैकुंठ के वासी भगवान विष्णु ने आपकी कन्या का वरण स्वीकार किया है, क्या आपको स्वीकार है। राजा हिमांचल ने कहा, महाराज मेरा सौभाग्य है जो कि मेरी कन्या को विष्णु जी ने स्वीकार किया।मैं अपनी कन्या का विवाह उनके साथ करूंगा। यह देखकर नारदजी बैकुंठ चले गए और भगवान विष्णु से उनके विवाह का पू्र्ण होना सुनाया। यह सुनकर तुम्हें बहुत दुख हुआ, और तुम अपनी सखी के पास पहुंचकर विलाप करने लगी। तुम्हारा विलाप देखकर सखी ने तुम्हारी इच्छा जानकर कहा, देवी मैं तुन्हें ऐसी गुफा में तपस्या के लिए ले चलूंगी जहां महाराज हिमाचल भी न पा सकें।
ऐसा कहकर उमा सहेली सहित हिमालय की गहन गुफाओं में विलीन हो गईं। तब महाराज हिमाचल घबरा गए, और पार्वती को ढ़ंढ़े हुए विलाप करने लगे कि मैंने विष्णु जी को जो वचन दिया है, वो कैसे पूरा हो सकेगा। ऐसा कहकर बेहोश हो गए। उस समय तुम अपनी सहेली के साथ ही गहन गुफा में पहुंच बिना अन्न और जल के मेरे व्रत को आरंभ करके, नदी की बालू का लिंग लाकर विविध फूलों से पूजन करने लगीं। उस दिन भाद्र मास की तृतीया और शुक्ल पक्ष, हस्त नक्षत्र था। तुम्हारी पूजा के कारण मैं और मेरा सिंहासन हिल उठा और तुम्हारा कठोर तपस्या से मैं वहां गया और मैंने तु्म्हें दर्शन दिए। मैंने तुमसे कहा -हे देवी मैं तुम्हारे व्रत और पूजन से बहुत प्रसन्न हूं। तुम मुझसे अपनी इच्छा मांग सकती हो।


