उज्जैन की कुलदेवी, यहां गिरी थी माता की कोहनी, हरसिद्धि मंदिर में दीपदान का है खास महत्व
Harsiddhi mata mandir: मध्य प्रदेश के उज्जैन की धार्मिक नगरी में शिव के साथ शक्ति भी विराजमान है,ऐसा माना जाता है कि हर(शिव) के साथ शक्ति(सिद्धि) विराजमान है इसलिए भी इन्हें हरसिद्धि माता कहा गया, मंदिर में ध्वजा के पास है एक यंत्र लगा हुआ है जिसकी पूजा नवरात्रि के दौरान पूजन किया जाता है।

मध्य प्रदेश के उज्जैन की धार्मिक नगरी में शिव के साथ शक्ति भी विराजमान है,ऐसा माना जाता है कि हर(शिव) के साथ शक्ति(सिद्धि) विराजमान है इसलिए भी इन्हें हरसिद्धि माता कहा गया, मंदिर में ध्वजा के पास है एक यंत्र लगा हुआ है जिसकी पूजा नवरात्रि के दौरान पूजन किया जाता है।बताया जाता है कि रात को हरसिद्धि मंदिर के पट बंद होने के बाद गर्भगृह में विशेष पर्वों के अवसर पर श्रीसूक्त और वेदोक्त मंत्रों के साथ होने वाली इस पूजा का तांत्रिक महत्व है। भक्तों की मनोकामना के लिए विशेष तिथियों पर भी यह पूजन किया जाता है। उज्जैन में चैत्र नवरात्रि 2083 विक्रम सवंत गुड़ी पड़वा के अवसर पर धार्मिक आस्था और परंपरा का विशेष उत्साह देखने को मिल रहा है, विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन में शिव के साथ शक्ति भी विराजमान है. इसलिए यहा हर उत्स्व बड़े ही धूमधाम के साथ मे मनाया जाता है।
19 मार्च से शुरू हो रही चैत्र नवरात्रि को लेकर उज्जैन के प्रसिद्ध हरसिद्धि माता मंदिर में सुबह घट स्थापना की गई उसके बाद माता की आरती की गई। इससे पहले मंदिर परिसर को फूलों और आकर्षक विद्युत लाइटिंग से सजाया गया है और भक्तों की सुविधा के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। 27 मार्च तक चलने वाले इस पर्व में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की संभावना जताई जा रही है। बढ़ती भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी कर दी है, ताकि सभी भक्तों को सुरक्षित और सुगम दर्शन मिल सकें।
यंहा गिरी थी माता की कोहनी
उज्जैन की धार्मिक नगरी मे हर के साथ सिद्धि, शिव और शक्ति की आस्था और परंपरा का अनूठा संगम है, 51शक्तिपीठों में से एक मां हरसिद्धि के मंदिर में सुबह से ही भक्तो का तांता लगा हुआ है। मान्यता के अनुसार हरसिद्धि माता को राजा विक्रमादित्य की कुलदेवी बताया जाता है,इसी वजह से यह उज्जैन की भी कुलदेवी है। पुराणिक महत्व के अनुसार यंहा माता सती की कोहनी गिरी थी।
उज्जैन की कुलदेवी
मंदिर के पुजारी के अनुसार कई कथाएं मंदिर से जुड़ी बताई जाती है,ऐसा कहा जाता है की उज्जैन के राजा विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के परम भक्त थे। ओर हर बारह साल में एक बार वे अपना सिर माता के चरणों में अर्पित कर देते थे, लेकिन माता की कृपा से पुन: नया सिर मिल जाता था। बारहवीं बार जब उन्होंने अपना सिर चढ़ाया तो वह फिर वापस नहीं आया। आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे रुण्ड पड़े हैं। कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं। माता हरसिद्धि को सम्राट विक्रमादित्य ओर उज्जैन की कुलदेवी भी कहा जाता है।
हरसिद्धि नाम कैसे पड़ा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ऐसा बताया जाता है कि चंड और मुंड नामक दो दैत्यों ने एक बार कैलाश पर कब्जा करने की योजना बनाई। दोनों जब वहां पहुंचे तब माता पार्वती और भगवान शंकर द्यूत-क्रीड़ा में व्यस्त थे। चंड और मुंडे ने अंदर घुसने की कोशिश की, लेकिन द्वार पर ही शिव के नंदीगण ने उन्हें रोक दिया। दोनों दैत्यों ने नंदीगण को शस्त्र से घायल कर दिया। भगवान शिव को जब इसका पता चला तो उन्होंने चंडी देवी का स्मरण किया। शिव की आज्ञा से देवी ने दोनों दैत्यों का वध कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि आपने दुष्टों का वध किया है। इसलिए आप हरसिद्धि नाम से प्रसिद्ध होंगी। तभी से महाकाल वन में हरसिद्धि माता विराजमान हैं।
तंत्र मंत्र साधना का स्थान,नवरात्रि पर तांत्रिक अनुष्ठान का भी है क्षेत्र
उज्जैन में वैसे तो माता गढ़कालिका,भूखी माता के साथ महामाया ओर महालया माता का भी विशेष स्थान है इनमे से गढ़कालिका माता को तंत्र मंत्र और तांत्रिक क्रियाओं के लिए जाना जाता है,बताया जाता है कि नवरात्रि में यंहा कई प्रकार की तांत्रिक क्रियाएं की जाती है और मनोकामना पूर्ण होने के लिए विशेष अनुष्ठान होते है,वंही भूखी माता के बारे में प्रचलित कथा है कि यहां मनोकामना पूर्ण होने पर पशु बलि चढ़ाई जाती है जैसे (बकरा,मुर्गा) ऐसा कहा जाता है कि प्राचीन समय में माता गांव में युवाओं को उठाकर ले जाती थी और उनका भक्षणं कर लेती थी राजा विक्रमादित्य ने एक बार खुद को बलि देने के लिए तैयार किया और माता के लिए व्यंजन बनवा दिए किस पर खुश होकर माता ने वरदान मांगने को कहा जिस पर राजा विक्रमादित्य ने शहर की खुशहाली के लिए उन्हें नदी के उसे पर जाकर रहने का आग्रह किया वरदान स्वरूप 2 माता शाहत के बाहर क्षिप्रा नदी के उस पार चली गई।
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