हनुमान जी सीखें, ज्ञान-भक्ति के साथ कर्म भी जरूरी

Anuradha Pandey लाइव हिन्दुस्तान, रामकिंकर उपाध्याय
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Hanuman ji: हनुमान ने भी लंका को देखा, परंतु वैराग्य के शिखर पर खड़े होकर लंका को देखा। यह बड़े महत्व का सूत्र है। इन वस्तुओं का आकर्षण जब आए, तो वैराग्य के ऊंचे शिखर पर चढ़ जाना चाहिए। वैराग्य के शिखर पर जाने का परिणाम यह हुआ कि हनुमान ने निर्णय किया कि इस लंका को तो जला देना चाहिए।

हनुमान जी सीखें, ज्ञान-भक्ति के साथ कर्म भी जरूरी

पौराणिक कथाओं के अनुसार ज्येष्ठ मास के मंगलवार के दिन ही राम सीता को खोजते हुए पहली बार हनुमान से मिले थे। विद्यावान, बजरंगबली, अतुलित बलधामा, संकटमोचन जैसे अनेक विशेषणों से युक्त होने पर भी उन्हें राम का सेवक और भक्त रूप ही भाया।का यात्रा में हनुमान तीन पर्वत-शिखरों पर गए। पहले बंदरों के साथ यात्रा की और स्वयंप्रभा के पास गए। उसके पूर्व पर्वत-शिखर पर गए। इसके बाद जब छलांग लगाने लगे, तो दूसरे पर्वत-शिखर पर चढ़े। जब छलांग लगाकर सागर पार पहुंच गए, तो लंका को देखने के लिए पर्वत के तीसरे शिखर पर चढ़े। ये यात्रा के तीन शिखर हैं। अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग शिखर हैं। देहाभिमान के समुद्र को पार करने के पहले जरा देह से तो मुक्त हो जाइए! हमारे लिए देह का समुद्र पार करना ही कठिन हो रहा है, फिर देहाभिमान की बात ही क्या? इस यात्रा में पहला पर्वत-शिखर क्या है? जब बंदर मार्ग भूल गए और प्यास से व्याकुल हो गए, तो हनुमान पहले शिखर पर पहुंचे। यही है विश्वास का शिखर। जब जीवन में कभी वन में मार्ग भूल जाएं, जैसे बंदर मार्ग भूल गए, तो क्या करना चाहिए? वन क्या है? रामायण की भाषा में यह वन संशय है।

विश्वास का शिखर

जीवन में यदि संशय आ जाए, भटकाव आ जाए, तो क्या करें? हनुमान ने प्यासे बंदरों के लिए उस भटकाव में एक उपाय सोचा। जीवन में जब कभी अतृप्ति का अनुभव हो, संशय का अनुभव हो, तो क्या करें? हनुमान यदि न होते, तो बेचारे सब बंदर क्या करते? प्रतापभानु भी जब भटक गया, प्यासा हुआ और मार्ग भूल गया, तो अंत में रावण बनना पड़ा, यह ‘रामायण’ में हम पढ़ते हैं। यदि हनुमान न होते, तो पता नहीं बेचारे बंदरों की क्या दशा होती? नीचे तो जल नहीं मिला, अब जरा ऊपर चढ़कर देखें। बंदरों ने कहा, आप ही जरा ऊपर चढ़कर देख आइए! यह विश्वास का शिखर है।

विचार कर दूर करें संशय

जब संशय के वन में हम भटकें, तो हम ऊपर उठें और विश्वास के शिखर पर पहुंच जाएं। जब हनुमान ने देखा कि जल के पक्षी उस गुफा में जा रहे हैं, तो हनुमान ने बंदरों को निमंत्रण दिया कि आइए! आइए!! इस गुफा में जल अवश्य है। अंगद आगे-आगे चल रहे थे, परंतु गुफा में आगे चलने का साहस अंगद में नहीं था, क्योंकि उनके परिवार में जो झगड़ा हुआ, वह गुफा को लेकर ही तो हुआ था। हनुमान के नेतृत्व में सभी ने गुफा में प्रवेश किया और वहां सबको जल पीने को मिला और सीता के खोजने का उपाय भी स्वयंप्रभा से प्राप्त हुआ। स्वयंप्रभा स्वयं प्रभु की कृपा है। जीवन में जब कभी भी संशय आए, तो हम ऊपर विचार के शिखर पर जाएं। अंत में भगवान की शरणागति का जल पीकर, फल खाकर आगे कदम बढ़ाएं। पहला शिखर विश्वास का शिखर है, जहां पर भगवान की कृपा ही कृपा दिखाई दे रही है। समुद्र लंघन के पूर्व हनुमान दूसरे पर्वत शिखर पर जाते हैं। यह दूसरा शिखर है, विचार का। विचार के द्वारा ही देहाभिमान का समुद्र पार किया जाता है।

वैराग्य से दूर होगा माया का मोह

तीसरा शिखर, जिस पर हनुमान समुद्र पार करने के पश्चात चढ़े, वह वैराग्य का है। इस पर चढ़कर उन्होंने लंका को देखा। लंका को ऊपर से देखा, नीचे से नहीं। लंका में कामिनी और कंचन दोनों का बड़ा दिव्य आकर्षण है। ऐसी लंका को यदि देखना हो, तो देखते ही व्यक्ति फंस जाएगा। हनुमान ने भी लंका को देखा, परंतु वैराग्य के शिखर पर खड़े होकर लंका को देखा। यह बड़े महत्व का सूत्र है। इन वस्तुओं का आकर्षण जब आए, तो वैराग्य के ऊंचे शिखर पर चढ़ जाना चाहिए। वैराग्य के शिखर पर जाने का परिणाम यह हुआ कि हनुमान ने निर्णय किया कि इस लंका को तो जला देना चाहिए। लंका को जला देने का जो संकल्प जाग्रत हुआ, यह वैराग्य की ऊंचाइयों के कारण हुआ। हनुमान तो इतने विशाल हैं कि देहाभिमान उनका क्या करेगा? हनुमान बंदरों को आश्वासन देते हैं।

प्रभु के नाम का आश्रय

हनुमान केवल ज्ञानी ही नहीं हैं। उन्हें केवल तत्वज्ञान का ही आश्रय नहीं है। ‘रामायण’ की मान्यता है कि कितना भी बड़ा ज्ञानी क्यों न हो? अगर वह भक्ति की निंदा करेगा, तो वह ऊपर से जरूर नीचे गिरेगा। हनुमान तो शिखर पर हैं। यहां बहुत बढ़िया उपाय गोस्वामीजी ने बताया। ऊपर उठना तो बहुत बढ़िया है, परंतु जितना अधिक ऊपर उठेंगे, उतना ही अधिक नीचे गिरने का डर भी बढ़ेगा। हनुमान ने सोचा कि ऊपर चढ़ तो गए, लेकिन कोई संभालने वाला भी तो चाहिए। तब गोस्वामीजी ने बहुत बढ़िया सूत्र दिया कि हनुमान ने क्या किया? बार-बार प्रभु का स्मरण किया। ‘महतो महीयान्’ हो जाने के बाद भी हनुमान के चरित्र में जो भक्ति का पक्ष दिखाई देता है, उसी का आश्रय लेकर वे आगे बढ़ते हैं।

बाण को देखकर लगता है कि बाण चल रहा है, परंतु बुद्धिमान व्यक्ति यह जानता है कि बाण में स्वयं चलने की शक्ति नहीं है। बाण धनुष के द्वारा चलाया जाता है और धनुष धनुषधारी के द्वारा चलाया जाता है। चलाने वाले की भुजा में जितनी अधिक शक्ति है, बाण उतनी ही तीव्र गति से जाता है। हनुमान ने कहा कि चलता हुआ तो मैं दिखाई देता हूं, लेकिन मैं तो बाण हूं, जिसको चलाने वाले धनुषधारी हमारे प्रभु हैं और वे अपनी शक्ति के द्वारा जो कार्य मुझसे लेना चाहते हैं, मैं वही कार्य करने लगता हूं। इस तरह से हनुमान भक्ति-संयुक्त ज्ञान के आश्रय से उस देहाभिमान के समुद्र को पार करते हैं, अनेक विघ्न बाधाओं को पार करते हैं। यह है हनुमान का भक्तियुक्त ज्ञानयोग, जिसमें कर्मयोग भी है, क्योंकि वे श्रेष्ठतम कर्म करते हुए भी ज्ञान और भक्ति का आश्रय लिए हुए हैं।

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


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अनुराधा पांडे पत्रकारिता जगत का एक अनुभवी चेहरा हैं, जिन्हें मीडिया में 16 वर्षों का व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और संस्थान के एस्ट्रोलॉजी और करियर सेक्शन की इंचार्ज हैं। अनुराधा पिछले 10 सालों से लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में लिख रही हैं। डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उन्होंने धर्म जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी से करोड़ों पाठकों का भरोसा जीता है। उनके पास खबरों को न केवल प्रस्तुत करने, बल्कि सरल जानकारी, संतुलित सलाह, भरोसेमंद और विश्लेषणात्मक कंटेंट देने का लंबा अनुभव है। वह शिव महापुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और कई अन्य शास्त्रों के जटिल तथ्यों को अपने शब्दों में लिखकर पाठकों तक पहुंचाती हैं।


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