


बजरंगबली हैं भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार, अष्ट सिद्धि और नव निधि के दाता, चिरंजीवी हनुमान बल, बुद्धि, साहस और निस्वार्थ भक्ति का हैं प्रतीक
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निश्चय प्रेम प्रतीति ते, विनय करैं सनमान ।
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करें हनुमान ॥
जय हनुमन्त संत हितकारी । सुन लीजै प्रभु अरज हमारी ।।
जन के काज बिलम्ब न कीजै । आतुर दौरि महासुख दीजै ।।
जैसे कूदी सिन्धु महि पारा । सुरसा बदन पैठी विस्तारा ।।
आगे जाय लंकिनी रोका । मारेहु लात गई सुर लोका ।।
जाय विभीषण को सुख दीन्हा । सीता निरखि परम-पद लीना ।।
बाग उजारि सिन्धु मह बोरा । अति आतुर जमकातर तोरा ।।
अक्षय कुमार मारि संहारा । लूम लपेटि लंक को जारा ।।
लाह समान लंक जरि गई । जय-जय धुनि सुरपुर में भई ।।
अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी । कृपा करहु उर अन्तर्यामी ।।
जय जय लखन प्रान के दाता । आतुर होई दु:ख करहु निपाता ।।
जै गिरिधर जै जै सुख सागर । सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥
ओम हनु हनु हनु हनुमंत हठीले । बैरिहि मारु बज्र की कीले॥
गदा बज्र लै बैरिहि मारो । महाराज प्रभु दास उबारो ।।
ओंकार हुंकार महाप्रभु धाओ । बज्र गदा हनु विलम्ब न लाओ ।।
ओम ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा । ओम हुं हुं हुं हनु अरि उर-सीसा॥
सत्य होहु हरी शपथ पायके । राम दूत धरु मारू जायके
जय जय जय हनुमन्त अगाधा । दुःख पावत जन केहि अपराधा ।।
पूजा जप-तप नेम अचारा । नहिं जानत हो दास तुम्हारा ।।
वन उपवन मग गिरि गृह मांहीं । तुम्हरे बल हम डरपत नाहीं ।।
पायं परौं कर जोरी मनावौं । येहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।
जय अंजनी कुमार बलवंता । शंकर सुवन वीर हनुमंता ।।
बदन कराल काल कुलघालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक ।।
भूत प्रेत पिसाच निसाचर। अगिन वैताल काल मारी मर ।।
इन्हें मारु, तोहि शपथ राम की । राखउ नाथ मरजाद नाम की ।।
जनकसुता हरि दास कहावो । ताकी शपथ विलम्ब न लावो ।।
जै जै जै धुनि होत अकासा । सुमिरत होत दुसह दुःख नासा ।।
चरण शरण कर जोरि मनावौं । यहि अवसर अब केहि गोहरावौं ।।
उठु उठु चलु तोहि राम-दोहाई । पायँ परौं, कर जोरि मनाई ।।
ओम चं चं चं चं चपल चलंता । ओम हनु हनु हनु हनु हनुमन्ता ।।
ओम हं हं हाँक देत कपि चंचल । ओम सं सं सहमि पराने खल-दल ।।
अपने जन को तुरत उबारौ । सुमिरत होय आनंद हमारौ ।।
यह बजरंग बाण जेहि मारै। ताहि कहो फिर कोन उबारै ।।
पाठ करै बजरंग बाण की । हनुमत रक्षा करैं प्रान की ।।
यह बजरंग बाण जो जापैं । ताते भूत-प्रेत सब कापैं ।।
धूप देय अरु जपै हमेशा । ताके तन नहिं रहै कलेसा ।।
दोहा
प्रेम प्रतीतिहि कपि भजै, सदा धरै उर ध्यान ।
तेहि के कारज सकल सुभ, सिद्ध करैं हनुमान ।।

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बजरंग बाण भगवान हनुमान की स्तुति में रचित एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली स्रोत है। जिसका शाब्दिक अर्थ है 'हनुमान जी का बाण।' माना जाता है कि इसका नियमित रूप से पाठ करने से संकट और शत्रुओं का अतिशीघ्र नाश होता है।
बजरंग बाण का पाठ किसी भी दिन भक्ति-भाव के साथ किया जा सकता है। लेकिन मंगलवार और शनिवार का दिन हनुमान जी को समर्पित है, इसलिए इस दिन इस पाठ को करना अत्यंत शुभ और लाभकारी माना जाता है। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि इसे नियमित पूजा में शामिल नहीं करना चाहिए, इसका पाठ विकट और विषम परिस्थितियों में ही करना चाहिए।
बजरंग बाण का पाठ रोजाना विधिपूर्वक और संकल्प के साथ करना उत्तम माना जाता है, खासतौर पर जब आप किसी बड़े संकट या विपरीत स्थिति से गुजर रहे हों। नियमित पूजा में हनुमान चालीसा का पाठ शामिल करना चाहिए।
पाठ से पहले स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिए। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करनी चाहिए। मन ही मन में हनुमान जी का ध्यान लगाना चाहिए। मान्यता है कि ऐसा करने से हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
बजरंग बाण के पाठ से पहले या बाद में "ॐ हं हनुमते नमः" मंत्र का जप करना अति लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा आप हनुमान जी के मंत्र और उनके नामों का भी जाप कर सकते हैं।
हनुमान चालीसा और बजरंग बाण दोनों ही भगवान हनुमान को प्रसन्न करने और उनकी कृपा पाने के लिए परम शक्तिशाली माध्यम हैं। दोनों की रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की है, लेकिन इनके महत्व, उद्देश्य और पाठ करने के नियमों में काफी बड़ा अंतर है।