
सिर्फ मृत्यु का ग्रंथ नहीं, लंबी उम्र का राज भी बताता है गरुड़ पुराण
गरुड़ पुराण के प्राचीन नुस्खे चर्चा में खांसी, कफ और हृदय रोग के लिए औषधीय मिश्रण बताए गए हैं, जो आज के दमघोटू प्रदूषण की तकलीफों से बचने की लिए कारगर है।
गरुण पुराण को लोग अक्सर सिर्फ मृत्यु से जुड़ा ग्रंथ समझते हैं लेकिन सच इसके उलट कहीं ज्यादा दिलचस्प और उपयोगी है। गरुड़ पुराण सिर्फ मृत्यु का ग्रंथ नहीं, लंबी उम्र का राज भी बताता है। यह बात आज के दौर में और भी सटीक लगती है, क्योंकि इस ग्रंथ में ऐसे कई देसी नुस्खे, औषध-मिश्रण और देह-शोधन के सूत्र मिलते हैं जो मौसमी रोगों, कफ-विकार और प्रतिरोधक क्षमता जैसी समस्याओं में आज भी प्रदूषण भरे दौर में प्रासंगिक दिखाई देते हैं।
गरुड़ पुराण में खांसी का कारगर इलाज
आज जब मौसमी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं और प्रदूषण शरीर को कमजोर कर रहा है, लोग इस प्राचीन ज्ञान की ओर फिर मुड़ रहे हैं। विष्णु-शिव संवाद में वर्णित औषध नुस्खा सुर्खियों में गरुड़ पुराण के एक खास प्रसंग में भगवान विष्णु शिवजी से एक शक्तिशाली मिश्रण का जिक्र करते हैं, शहद, घृत, पिप्पली चूर्ण और दूध से बना क्वाथ, जिसे खांसी, विषम ज्वर (यानी शुरुआती बुखार के लक्षण) और हृदय-संबंधी दिक्कतों में उपयोगी बताया गया है। आयुर्वेद कहता है कि यह मिश्रण शरीर की अग्नि को संतुलित करता है, श्वसन तंत्र को बल देता है और जमाव वाली समस्याओं में राहत पहुंचाता है। खांसी-जुकाम के इस मौसम में इसकी चर्चा स्वाभाविक तौर पर बढ़ गई है।
कफ-विकार को शांत करने वाले अन्य नुस्खे
कफ का जमाव, बलगम की मोटाई या सीने में भारीपन जैसी दिक्कतें आज के वातावरण में आम हो चुकी हैं। इन्हें शांत करने के लिए गरुड़ पुराण में एक चूर्ण का जिक्र मिलता है, जिसमें बिजौरा नींबू के बीज, इलायची, मुलेठी, पिप्पली, चमेली की पत्तियां के चूर्ण को शहद के साथ चाटकर लेने की सलाह दी गई है। कहा गया है कि यह कफ-दोष कम करता है और गले में जमा बलगम को ढीला करता है।
शरीर की अंदरूनी सफाई, लंबी उम्र और स्वस्थ शरीर पर खास जोर
गरुड़ पुराण में शरीर की अंदरूनी सफाई, लंबी उम्र और स्वस्थ शरीर के लिए भी टिप्पणी की गई है। ग्रंथ का स्पष्ट मत है कि जब शरीर शुद्ध रहता है तो रोग आसानी से टिक नहीं पाते। कफ, पित्त और वात का संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य की पहचान है, और नियमित शोधन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता स्वाभाविक रूप से मजबूत होती जाती है। आज के दौर में, जब जीवनशैली अनियमित हो चुकी है और प्रदूषण लगातार शरीर पर असर डाल रहा है, लोग इस पारंपरिक सिद्धांत को फिर से गंभीरता से समझने लगे हैं।





