
जीवन के लक्ष्य को पहचानना है सबसे जरूरी, क्या अतीत से मिल सकती है मुक्ति?
संक्षेप: Life Real Purpose Pravachan: जीवन के असली लक्ष्य को पहचानना सबसे जरूरी है। हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण चीजें क्या हैं? ये जान जाएंगे को जिंदगी की आधे से ज्यादा दिक्कतें तो अपने आप ही खत्म हो जाएंगी।
जब मन ज्ञात से पूरी तरह मुक्त होता है, तभी आप स्पष्टता, सच्चाई और यथार्थ अनुभव के साथ पता लगा सकते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं है। मन मात्र यही कर सकता है कि इस बात की जांच करे कि स्वयं को ज्ञात से मुक्त करना संभव है अथवा नहीं। ज्ञात से मुक्त होना अतीत के सारे प्रभावों, परंपरा के सारे भार से मुक्त हो जाना है। मन अपने आप में ज्ञान की उपज है। जब यह उदित होता है, तब ज्ञात चेतन और अचेतन स्तर पर पूरी तरह समाप्त हो जाता है।

जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है? सबसे पहले तो यही कि आप इसका करते क्या हैं? जीवन का लक्ष्य वही है, जो आप इसे बनाएंगे। जैसे आप किसी दुखी मनुष्य के पास जाएंगे, तो वह कहेगा कि उसके लिए जीवन का लक्ष्य प्रसन्न होना है। जो मनुष्य भूखा जी रहा है, उसका लक्ष्य होगा कि पेट भरा होना चाहिए। अगर एक संन्यासी के पास जाएं, तो उसका लक्ष्य ईश्वर को पाना है। यह लक्ष्य, लोगों की भीतरी चाह, कुछ ऐसा पाने की चाह है, जो परितोषप्रद तथा आरामदायक हो। वे एक प्रकार की सलामती चाहते हैं, सुरक्षा चाहते हैं, ताकि कोई संशय, प्रश्न, व्यग्रता या भय न रहे। हममें से अधिकांश एक स्थायी वस्तु चाहते हैं, जिससे चिपके रह सकें।
जीवन के तत्व को अनुभव करना होगा
क्या हम जीवन को सीधे-सीधे समझ सकते हैं अथवा हमें अपने जीवन को अर्थ प्रदान करने के लिए किसी तत्व का अनुभव करना होगा? क्या वह तत्व प्रेम है? क्या प्रेम का एक कारण होना चाहिए? और यदि प्रेम का कोई कारण हो, तो क्या वह प्रेम होगा? यदि हमें अपने जीवन को कुछ अर्थ प्रदान करना है, तो उसके लिए कुछ अनुभव घटित होना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि जीवन अपने आप में महत्वपूर्ण नहीं है? वह वास्तव में ईश्वर की तलाश में खुद से पलायन कर रहा है। शोक, सौंदर्य, कुरूपता, क्रोध, क्षुद्रता, ईर्ष्या व जीने की असाधारण जटिलताओं से पलायन कर रहा है। यह सब ही जीवन है। चूंकि वह इस सब को समझ नहीं पाता, इसलिए कहता है, ‘मैं कुछ वस्तु खोजूंगा, जो मेरे जीवन को अर्थ प्रदान कर सके।’ आप इस बारे में ढेर सारे शब्द बुन सकते हैं। इस धरती की समस्त पवित्र पुस्तकें पढ़ सकते हैं, लेकिन वह व्यर्थ होगा, क्योंकि वह आपके जीवन से, आपके दैनंदिन अस्तित्व से जुड़ा हुआ नहीं होगा।
अपने-अपने सुखों की तलाश
क्या है हमारा जीवन? वह क्या है, जिसे हम अपना अस्तित्व कहते हैं? दार्शनिक रूप से नहीं, सहज रूप से देखें, तो यह सुख और पीड़ा के अनुभवों की शृंखला है तथा हम सुखों को पकड़े रह कर पीड़ा को टालना चाहते हैं। शक्ति का सुख, सत्ता की बड़ी दुनिया में बड़ा आदमी होने का सुख, अपने पति या पत्नी पर आधिपत्य जमाने का सुख, पीड़ा, हताशा, महत्त्वाकांक्षा के साथ आने वाली दुश्चिंता, महत्वपूर्ण व्यक्तियों की चाटुकारिता करके लाभ उठाने की कुरूपता आदि इस सबसे ही हमारा रोज का जीवन निर्मित होता है।
मतलब यह है कि जिसे हम जीवन कहते हैं, वह ज्ञात क्षेत्र के भीतर स्मृतियों की शृंखला है और यदि मन ज्ञात से मुक्त न हो, तो ज्ञात समस्या बन जाता है। ज्ञात के क्षेत्र में कार्य करते हुए- ज्ञात अर्थात ज्ञान, अनुभव और उस अनुभव की स्मृति। मन कहता है, ‘मुझे ईश्वर को जानना चाहिए।’ तो यह अपनी परंपराओं, धारणाओं, अपने संस्कारों के अनुसार एक सत्ता का प्रक्षेपण करता है, जिसे यह ईश्वर कह लेता है। यह सत्ता, ज्ञात का ही परिणाम है। वह अब भी समय के क्षेत्र के भीतर ही है।
अतीत के प्रभाव से मुक्ति का प्रयास
जब मन ज्ञात से पूरी तरह मुक्त होता है, तभी आप स्पष्टता, सच्चाई और यथार्थ अनुभव के साथ पता लगा सकते हैं कि ईश्वर है अथवा नहीं है। यह निश्चित है कि ऐसा कुछ जिसे ईश्वर अथवा सत्य कहा जा सके, वह नवीन होता है। आपकी पहचान के दायरे में नहीं होता, यदि वह मन से, ज्ञान से, अनुभव से, विचार से, संचित किए हुए सद्गुणों से इस तक जाने की कोशिश करता है, तो वह ज्ञात के क्षेत्र में रहते हुए अज्ञात को ग्रहण करने की चेष्टा कर रहा होता है, जो संभव ही नहीं है।
मन मात्र यही कर सकता है कि इस बात की जांच करे कि स्वयं को ज्ञात से मुक्त करना संभव है अथवा नहीं। ज्ञात से मुक्त होना अतीत के सारे प्रभावों, परंपरा के सारे भार से मुक्त हो जाना है। मन अपने आप में ज्ञान की ही उपज है। इसे समय द्वारा ‘यह मैं’ और ‘यह मैं नहीं’ के रूप में गढ़ा गया है, जो द्वैत का द्वंद्व ही है। यह ज्ञात चेतन और अचेतन स्तर पर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। मेरा कहना है, और यह बात मैं केवल सिद्धांतत: नहीं कह रहा हूं कि इसका समाप्त होना संभव है। तब आप कभी नहीं पूछेंगे कि ईश्वर है अथवा नहीं है, क्योंकि ऐसा मन अपने आप में ही अपरिमेय होता है। प्रेम की भांति, इसकी अपनी चिरंतनता होती है।





