एकादशी पारण में तुलसी का पत्ता क्यों जरूरी माना जाता है, जानें नियम और महत्व
एकादशी व्रत का पारण करते समय तुलसी दल का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी उपलब्ध न होने पर भी शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु का स्मरण कर विधि-विधान से पारण किया जा सकता है। जानें तुलसी का महत्व और पारण के नियम।

निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की पूजा के लिए सबसे महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है। इस व्रत का पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। पारण के समय ज्यादातर घरों में सबसे पहले तुलसी दल के साथ जल या चरणामृत ग्रहण किया जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल आता है कि पारण में तुलसी का इतना महत्व क्यों है? अगर घर में तुलसी न हो तो क्या व्रत का पारण किया जा सकता है? आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषाचार्यों की राय।
भगवान विष्णु को सबसे प्रिय है तुलसी
धार्मिक मान्यता है कि तुलसी भगवान विष्णु को सबसे प्रिय है। यही वजह है कि विष्णु पूजा में तुलसी दल अर्पित किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। चूंकि एकादशी का व्रत भी भगवान विष्णु को समर्पित होता है, इसलिए पारण के समय तुलसी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि तुलसी के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करने से व्रत का पुण्य और बढ़ जाता है।
पारण में तुलसी का उपयोग क्यों किया जाता है?
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, पारण सिर्फ व्रत खोलने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु के प्रति आस्था व्यक्त करने का भी समय होता है। इसलिए कई लोग सबसे पहले तुलसी डालकर जल पीते हैं या चरणामृत ग्रहण करते हैं। इसके बाद फल या सात्विक भोजन से व्रत खोला जाता है। यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और आज भी अधिकांश वैष्णव परिवारों में निभाई जाती है।
क्या तुलसी के बिना पारण नहीं किया जा सकता?
इस सवाल का जवाब जानना भी जरूरी है। धार्मिक विद्वानों का कहना है कि अगर किसी कारण से घर में तुलसी उपलब्ध नहीं है तो केवल इसी वजह से पारण नहीं रोकना चाहिए। द्वादशी के शुभ समय में पारण करना अधिक जरूरी माना गया है। जहां तुलसी उपलब्ध हो, वहां उसका उपयोग करना शुभ माना जाता है। लेकिन तुलसी न मिलने पर भगवान विष्णु का स्मरण करके भी पारण किया जा सकता है।
पारण की सही शुरुआत कैसे करें?
पारण से पहले भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें भोग अर्पित करें। इसके बाद जल या चरणामृत ग्रहण करें। अगर तुलसी दल उपलब्ध हो तो उसे जल या चरणामृत में डालकर ग्रहण करें। इसके बाद फल, दूध या हल्के सात्विक भोजन से व्रत खोलें। धार्मिक मान्यता है कि इससे पारण की प्रक्रिया पूरी मानी जाती है।
तुलसी सिर्फ परंपरा नहीं, आस्था का प्रतीक भी है
हिंदू धर्म में तुलसी को देवी का स्वरूप माना गया है। घर में तुलसी का पौधा होना शुभ माना जाता है। रोज तुलसी की पूजा करने और भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। यही कारण है कि एकादशी, देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह और भगवान विष्णु से जुड़े अन्य पर्वों में भी तुलसी का विशेष महत्व बताया गया है।
एकादशी व्रत पारण में तुलसी का उपयोग भगवान विष्णु के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, किसी कारण से तुलसी उपलब्ध न हो तो पारण को टालना उचित नहीं माना जाता। शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए विधि-विधान से पारण करना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। जहां तुलसी उपलब्ध हो, वहां उसके साथ पारण करना धार्मिक दृष्टि से अधिक शुभ माना जाता है।
डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम यह दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य एवं सटीक हैं। विस्तृत और अधिक जानकारी के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।
लेखक के बारे में
Yogesh Joshiयोगेश जोशी डिजिटल पत्रकारिता में 8 वर्षों से सक्रिय हैं और वर्तमान में लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में सीनियर कंटेंट प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं। ज्योतिष और धार्मिक विषयों पर उनका लेखन पाठक-केंद्रित और व्यावहारिक दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है। राशिफल, ग्रह-गोचर, दशा-महादशा, अंकज्योतिष, सामुद्रिक शास्त्र, वास्तु, फेंगशुई और पूजा-विधि जैसे विषय उनके काम का प्रमुख हिस्सा हैं।
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