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सच्ची समझ का दीया जल जल जाए तो रोज है दीवाली, समझें इसका असली मतलब

सच्ची समझ का दीया जल जल जाए तो रोज है दीवाली, समझें इसका असली मतलब

संक्षेप:

ज्ञान का दीपक नहीं जला, तो आप बाहर करोड़ों दीये जला लें, भीतर अंधकार ही रहेगा। जहां अज्ञान है, वहां दुख है, डर है, चिंता है। आज हम खुद से सवाल करें, हमारे जीवन में किस चीज का शासन है- बाहर की रोशनी का या भीतर के ज्ञान का?

Mon, 20 Oct 2025 09:51 AMGarima Singh लाइव हिन्दुस्तान
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वर्ष की सबसे काली रात अमावस्या पर दीपोत्सव मनाया जाता है। अमावस्या का अर्थ है अज्ञान। यह पूरे वर्ष की वह घोर निराशा और जड़ता है, जिसे हम जीवन की भागदौड़ में बटोर लेते हैं। दीपावली का दिव्य संदेश है- जहां अज्ञान है, वहां दुख है, डर है, चिंता है और सबसे बड़ी पीड़ा है- जन्म-मरण का चक्र, लेकिन जहां ज्ञान का दीपक जलता है, वहां ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ का बोध होता है। सब कुछ ब्रह्म है, उसके अलावा और कुछ भी नहीं।

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यदि सच्ची समझ का दीया जल जाए, तो हमारे लिए रोज दीपावली है। ज्ञान का दीपक नहीं जला, तो आप बाहर करोड़ों दीये जला लें, भीतर अंधकार ही रहेगा। महादेव के त्रिशूल से ब्रह्मा के अहंकार वाले पांचवें सिर का कट जाना इस बात का प्रतीक है कि आत्मज्ञान के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हमारा अहंकार है। वह भाव, जिससे हमने माया को जानने का मिथ्या दावा किया। जब तक हम यह मानते रहेंगे कि हम कर्ता हैं और संसार के रहस्य को जान सकते हैं, तब तक ज्ञान का उदय नहीं हो सकता।

‘योगवासिष्ठ’ में श्रीराम के वैराग्य को शांत करते हुए गुरु वसिष्ठ यही समझाते हैं कि यह सारा संसार कुछ और नहीं, बल्कि तेरे ही मन की रचना है, ठीक वैसे ही जैसे रात्रि का स्वप्न। यह माया है, जो प्रतीत तो होती है, पर वास्तव में है नहीं। गुरु वसिष्ठ कहते हैं- ‘हे राम! इसके पहले भी कई बार तेरा जन्म हो चुका है। हम पहली बार नहीं मिल रहे, न ही आखिरी बार।‘ यह ब्रह्मांडीय काल रेखाकार नहीं, बल्कि वृत्ताकार है, जिसमें न आदि है और न अंत। यह जीवन, कर्म, सुख-दुख का चक्र तब तक चलता रहेगा, जब तक हम अज्ञान को स्वीकार करते रहेंगे और स्वयं को शरीर तक सीमित मानते रहेंगे। ज्ञान का प्रकाश इस भ्रम को तोड़ता है और हमें इस शाश्वत सत्य से जोड़ता है कि न कोई जन्म है, न कोई मृत्यु, बस एक ही ब्रह्म स्वरूप है।

जब तक दीया जलता है...

जितनी काली अमावस्या की रात्रि होती है, फैली हुई रोशनी आंखों को उतनी ही अच्छी लगती है, लेकिन इस त्योहार में छिपा एक गहरा दर्शन है- दीपक की यह रोशनी तभी तक है, जब तक दीपक में तेल है और बत्ती है। जैसे ही तेल और बत्ती खत्म होते हैं, रोशनी खत्म हो जाती है। दीपक की यह क्षणभंगुरता हमें शरीर की नश्वरता का बोध कराती है।

जब तक शरीर में सामर्थ्य और शक्ति होती है, तभी तक यह संसार आपके साथ चलता है। एक बार शरीर की शक्ति कम हो गई या चली गई, तो शरीर के साथ जीना मुश्किल हो जाता है। आंखें देख नहीं पाती हैं, कान सुन नहीं पाते हैं, तब जीवन मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर तिजोरी में दस करोड़ या दस अरब भी रखे हों, तो भी सब व्यर्थ है।

इंसान सारा इंतजाम इसलिए करता है कि मैं सुरक्षित रहूं, लेकिन अंत में अक्सर निराशा ही हाथ लगती है। यह दीपक का तेल और बत्ती ही है, जो हमें जीवन भर भ्रम में रखते हैं। जब तक शरीर में सामर्थ्य होता है, तब तक बुद्धि नहीं चलती, हम धन तथा मान-सम्मान के अहंकार में डूबे रहते हैं। जब बुद्धि चलने लगती है, अर्थात शरीर कमजोर हो जाता है, रोग व कष्ट आते हैं, तब शरीर कुछ करने लायक नहीं रह जाता। दीपावली का यह दीपक हमें चेतावनी देता है कि समय रहते, जब तक शरीर में सामर्थ्य है, तभी ज्ञान का तेल और भक्ति की बत्ती भर लो, ताकि यह ज्ञान का प्रकाश कभी खत्म न हो।

सनातन विजय का पर्व

दीपावली पर भगवान राम के 14 वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने की घटना त्रेता युग में घटी थी, लेकिन इसका महत्व आज भी बना हुआ है। दुनिया की कई उन्नत सभ्यताएं आज केवल खंडहरों में सिमट गई हैं, पर सनातन धर्म एक जीवंत संस्कृति के रूप में आज भी हर त्योहार में सांस ले रहा है और आगे भी लेता रहेगा। श्रीराम का वनवास एक दुखद घटना नहीं, बल्कि आध्यात्मिक उत्थान का काल था। श्रीराम ने इसे अप्रतिम वरदान कहा। इस अवधि में श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी ने अपने गुरुकुल के ज्ञान को व्यवहार में जिया, उन्होंने कठिनतम परिस्थितियों में भी धर्म का पालन किया।

श्रीराम और देवी सीता का प्रेम हमें सिखाता है कि जीवन में सुख या दुख स्थान (महल या वन) से नहीं, सच्चे संबंध और समर्पण से आता है। सीताजी कहती हैं- ‘मेरी दृष्टि तो आपके ऊपर होगी, न कांटे दिखेंगे, न बीहड़ दिखेगा। मेरे आनंद का सरोवर इन्हीं श्री चरणों में है।’ उनका यह समर्पण दीवाली को एक प्रेम पर्व भी बनाता है।

सनातन धर्म का कोई संस्थापक नहीं है। हम श्रीराम या श्री कृष्ण का जन्म दिवस गिन सकते हैं, पर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर की उत्पत्ति का कोई दिन या तारीख नहीं है। यह दर्शन बताता है कि ईश्वर किसी ‘कारण’ से उत्पन्न नहीं हुआ। जिसका कार्य-कारण होता है, वही माया होती है और जो स्वयं माया-आधार है, वह कार्य-कारण से परे है। ब्रह्मा जब स्वयं के जन्म और कमल के डंठल का अंत नहीं खोज पाए, तब विष्णुजी ने कहा, ‘जिसका अंत मिल जाए, वह माया होती ही नहीं है।’ जिस प्रकार ईश्वर अनादि और अनंत है, उसी प्रकार आत्मा भी है। जब तक तुम स्वयं को उस ब्रह्म स्वरूप से नहीं जोड़ोगे, तब तक जीवन का दीपक बुझता रहेगा और तुम जन्म-मरण के झूलों में झूलते रहोगे।

इस दीपावली पर हमें अपने हृदय से अज्ञान को हटाना है, अहंकार त्यागना है और ज्ञान के उस शाश्वत प्रकाश को प्रज्वलित करना है, जो यह बोध कराए कि हम केवल एक शरीर नहीं हैं, बल्कि उस अनंत ब्रह्म का अंश हैं। यही दीपावली का संदेश है- भीतर से प्रकाशित होने का उत्सव!

Garima Singh

लेखक के बारे में

Garima Singh
गरिमा सिंह हिंदुस्तान लाइव में ज्योतिष सेक्शन में काम करती हैं। उन्हें पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव है। इससे पहले वह एंटरटेनमेंट बीट पर भी काम कर चुकी हैं। उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन और जामिया मिलिया इस्लामिया से टेलीविजन और रेडियो पत्रकारिता की पढ़ाई की है। और पढ़ें
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