
संतों के चमत्कारों को नहीं साधना को पूजें, जानें कैसे ईश्वरीय लीला में होते हैं शामिल
कुछ संत ऐसे हैं जो हमारे आसपास ही है। ये लोग ईश्वरीय लीला में शामिल होकर भगवान के कहे अनुसार सारी चीजें किए जा रहे हैं। सच्चे संत अप्रकट नहीं होते हैं। इनकी साधना में शक्ति है। इनके चमत्कारों को नहीं बल्कि इनकी साधना को पूजने से कई लाभ मिल सकते हैं।
संत साधना का आश्रय लेना परम आवश्यक है। इस साधना का अभ्यास करने से ज्यों-ज्यों हमारे अंदर गुणों का विकास होगा, त्यों-त्यों हम संत और संत कृपा के अधिकारी होंगे। अधिकांश सच्चे संत प्रायः अपने को लोगों में प्रकट नहीं करके जगत में विचरण करते हैं। संत-परंपरा के प्रसिद्ध संत आज भी हैं। वे हम लोगों के बीच में आते भी हैं; पर हम उन्हें पहचान नहीं पाते। भिन्न-भिन्न स्तरों पर भगवान का कार्य करने वाले ऐसे हजारों संत पृथ्वी पर हैं, जो लोकचक्षु से परे रहकर अपना महत कार्य कर रहे हैं। कहते हैं कि संत जगत में सब कार्य नियमपूर्वक होते हैं।

संतों के सर्वोपरि संचालक परम सद्गुरु भगवान शंकर हैं, जो रुद्ररूप में जगत का संहार और सुंदर शिवरूप में सबका सदा कल्याण करते हैं। उनकी अधीनता में अनेक सिद्ध-महात्मा संत पुरुष निरंतर ईश्वरीय लीला में सहायक होकर भगवान की आज्ञानुसार कार्य कर रहे हैं। इन संतों को कुछ लेना नहीं है। पूजा नहीं करवानी है। ख्याति और प्रशंसा से कोई सरोकार नहीं है। लोगों का प्रशंसा पात्र न होने से इनका कोई नुकसान नहीं होता। फिर ये लोगों के सामने प्रकट होकर क्यों अपना परिचय दें। अधिकारी पुरुष को इनमें से किन्हीं-किन्हीं के दर्शन आज भी होते हैं। कहा जाता है कि देवर्षि नारद, सनकादि, भगवान दत्तात्रेय, शुकदेव आदि प्राचीन और शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, गोरखनाथ, भर्तृहरि, कबीर, नानक, तुलसीदास, ज्ञानदेव आदि से लेकर रामकृष्ण परमहंस जैसे अनेक संतों के दर्शन आज भी उनके अंतरंग भक्तों को होते हैं।
इन संतों के अलावा ऐसे अनेक अज्ञात संत हैं, जो विविध स्थानों में विविध कार्य करते हुए हम लोगों के बीच रह रहे हैं, जो अज्ञात रूप से इस मंडल की दृष्टि और शासन सूत्र में बंधे रहने पर भी विभिन्न स्थानों में अप्रकट रूप से साधना कर रहे हैं। हमें यह नहीं समझना चाहिए कि जितने और जो हम लोगों की जानकारी में हैं, वे ही और उतने ही संत हैं। संतों के लिए यह कोई आवश्यक बात नहीं है कि वे संसार में प्रसिद्ध ही हों। उनमेंं प्रसिद्ध तो बहुत थोड़े ही होते हैं और साथ ही यह भी याद रखना चाहिए कि संत की प्रसिद्धि पाए हुए अनेक पुरुष वस्तुतः संत होते भी नहीं हैं। उनका केवल संत का ऊपरी बाना मात्र होता है।
मन असंत तथा विषयी ही होता है। ऐसे लोगों से संसार की बहुत बुराई होती है। ये धर्म-संचालन के कार्य में अयोग्य होते हुए भी जब उसमें अनधिकार प्रवेश कर बैठते हैं, तब अपने हृदय के विकारों और व्याधियों को ही जगत में फैलाते हैं और अपने संपर्क में आनेवाले नर-नारियों के जीवन को पापमय, दुखी और अशांतिपूर्ण ही बनाते हैं। सच्चे संत अधिकांश अप्रकट ही रहते हैं। उनकी कोई ख्याति या प्रसिद्धि नहीं होती। ऐसे सच्चे संतों को पाने और उन्हें पहचानने के लिए संत साधना का आश्रय लेना परम आवश्यक है। संतोचित साधना का अभ्यास करने से ज्यों-ज्यों हमारे अंदर उन गुणों का विकास होगा, त्यों-त्यों हम संत और संत कृपा के अधिकारी होंगे। कठिनता तो यह है कि हम संतों के चमत्कारों को ही पूजते हैं, उनकी साधना को नहीं, जिसके बिना हम यथार्थ लाभ से वंचित ही रह जाते हैं।

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