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धर्म और विज्ञान के बीच की कड़ी है दर्शन

darshan

मूल है, जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह सदैव ही अज्ञात है। जिसको हम जानते हैं, वह बहुत ही ऊपरी है। इसलिए कुछ बातें ठीक से समझ लेनी चाहिए, इसके पहले कि हम अज्ञात में उतरें। ये तीन शब्द- ज्ञात, अज्ञात, अज्ञेय समझ लेने जरूरी हैं सबसे पहले, क्योंकि उपनिषद अज्ञात से जुड़े हैं। वे समाप्त होते हैं अज्ञेय में। ज्ञात की भूमि विज्ञान बन जाता है; अज्ञात- दर्शनशास्त्र और अज्ञेय है धर्म से सम्बंधित।

दर्शनशास्त्र ज्ञात व अज्ञेय में, विज्ञान व धर्म के बीच एक कड़ी है। दर्शनशास्त्र पूर्णत: अज्ञात से सम्बंधित है। जैसे ही कुछ भी जान लिया जाता है, वह विज्ञान का हिस्सा हो जाता है और वह फिर दर्शन का हिस्सा नहीं रहता। इसलिए विज्ञान जितना बढ़ता जाता है, उतना ही दर्शनशास्त्र आगे बढ़ा दिया जाता है। जो भी जान लिया जाता है, विज्ञान का हो जाता है। दर्शनशास्त्र विज्ञान व धर्म के बीच की कड़ी है।

उपनिषद् अज्ञात से प्रारंभ होते हैं, और वे अज्ञेय पर समाप्त होते हैं। और जब मैं कहता हूं अज्ञेय, तो मेरा तात्पर्य है वह जो कि कभी जाना नहीं जा सकता। जिस क्षण हम अज्ञेय का सामना करते हैं, केवल तभी वह धर्म होता है। जब मैं कहता हूं अज्ञेय, तो मेरा आशय है उससे, जिसे कभी जाना नहीं जा सकता; परन्तु उसका सामना हो सकता है। उसका साक्षात्कार हो सकता है, परन्तु फिर भी वह अज्ञेय ही रहता है। केवल इतना ही अनुभव होता है कि अब हम एक गंभीर रहस्य में हैं, जिसे समझा नहीं जा सकता। इसलिए कुछ सूत्र समझ लेने चाहिए।

पहली बात यह है कि हम कैसे सुनते हैं। आप अपनी बुद्धि से, तर्क से सुन सकते हैं। यह एक तरीका है सुनने का, जो सामान्य है और बहुत उथला, क्योंकि तर्क के साथ आप सदैव या तो बचाव करने में लगे होते हैं या हमला करने में। जब तर्क से समझने की कोशिश करते हैं, तब उससे लड़ते हैं, *तब केवल एक परिचय होता है।

गहन अर्थ के लिए सहानुभूति के साथ सुनना अनिवार्य है। इसलिए तर्क से सुनना ठीक है, यदि तुम गणित, तर्कशास्त्र या कोई ऐसी बात सीख रहे हो, जो पूरी तरह बुद्धिगत हो।

अगर तुम कविता को भी तर्क से सुनोगे, तो तुम फिर अंधे हो जाओगे। यह ऐसा ही है, जैसे कि कोई कान से देखने का प्रयत्न करे अथवा आंखों से सुनने का प्रयत्न करे! तुम तर्क से कविता को नहीं समझ सकते। इसलिए एक दूसरी समझ भी होती है, जो तर्क से नहीं, बल्कि होती है प्रेम से, अनुभूति से, भावना से।

तर्क कभी अपने में किसी भी चीज को आसानी से नहीं गुजरने देता। तर्क को हराया जाना चाहिए, केवल तभी कुछ भीतर प्रवेश कर सकता है। यह बुद्धि का एक सुरक्षा का इंतजाम है। यह हर क्षण सावधान रहता है, कुछ भी भीतर नहीं जा सकता, बिना तर्क को पछाड़े। और अगर तर्क हार भी जाए, तो भी वह चीज आपके हृदय तक नहीं जा सकती, क्योंकि हार में आप सहानुभूतिपूर्ण नहीं हो सकते।

श्रवण का दूसरा आयाम है हृदय के द्वारा, भावना के द्वारा। कोई संगीत सुन रहा है, तब किसी विश्लेषण की जरूरत नहीं है। यदि आप एक आलोचक हैं, तो कभी संगीत नहीं समझ पाएंगे। हां, हो सकता है कि आप उसका गणित, उसकी छंद रचना, भाषा आदि सब के बारे में समझ जाए, परंतु संगीत को नहीं समझ पाएंगे। संगीत तो समग्र है। यदि तुम विवेचना करने को एक क्षण भी ठहरे तो तुमने बहुत कुछ खो दिया। वह एक बहती हुई समग्रता है। सच्चे संगीत की विवेचना कभी भी नहीं हो सकती, जब कि वह चल रहा हो। तुम केवल दर्शक नहीं हो सकते; तुम्हें तो उसमें भागीदार होना पड़ता है।

अतएव भावना में समझने का मार्ग हमारे स्वयं के भाग लेने से होकर आता है। आप संगीत को एक वस्तु नहीं बना सकते। तुम्हें तो उसकी गहनता में पूर्णत: डूब जाना होता है। ऐसे क्षण आएंगे, जब कि तुम नहीं होओगे और वहां केवल संगीत ही होगा। वे क्षण ही संगति के क्षण होंगे। तब तुम्हारे भीतर गहरे में कुछ प्रवेश कर जाता है।

तर्क कभी भी सहानुभूति के साथ नहीं सुन सकता। वह तो बहुत तार्किक पृष्ठभूमि से सुनता है। वह कभी प्रेम से तो सुन ही नहीं सकता, वह तो असंभव है।

(सौजन्य : ओशोधारा नानक धाम, मुरथल)

 

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