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मरे हुए बेटे को जीवित करना चाहती थी महिला, भगवान बुद्ध की इस बात से समझी, पढ़ें यह रोचक कहानी

Lord Buddha भगवान बुद्ध के समय में, किसागोतमी नाम की एक महिला के एकमात्र पुत्र की मृत्यु हो गई। दुख से परेशान होकर, वह अपने मृत पुत्र को पुनर्जीवित

भगवान बुद्ध
Anuradha Pandey नई दिल्ली, हिन्दुस्तान संवाददाताTue, 18 June 2024 08:15 AM
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भगवान बुद्ध के समय में, किसागोतमी नाम की एक महिला के एकमात्र पुत्र की मृत्यु हो गई। दुख से परेशान होकर, वह अपने मृत पुत्र को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से दवा पूछती हुई एक घर से दूसरे घर घूमने लगी। किसी ने उसे कह दिया कि भगवान बुद्ध के पास ऐसी दवा है।

किसागोतमी भगवान बुद्ध के पास पहुंची, उन्हें प्रणाम किया और पूछा, ‘क्या आप ऐसी दवा बता सकते हैं, जिससे मेरा मृत पुत्र जीवित हो उठे?’

‘मुझे ऐसी दवा के बारे में पता है,’ बुद्ध ने कहा। ‘परंतु उसके लिए मुझे कुछ चीजों की जरूरत पड़ेगी।’

महिला ने राहत की सांस लेते हुए पूछा, ‘आपको क्या चाहिए?’

‘मुझे एक मुट्ठी सरसों के बीज चाहिए,’ बुद्ध ने कहा।

महिला ने बुद्ध को वह सामग्री लाकर देने का वादा किया किंतु ज्यों ही वह जाने लगी, बुद्ध ने कहा, ‘सरसों के बीज उसी घर से लेकर आना, जहां कभी किसी संतान, पति-पत्नी, माता-पिता या सेवक की मृत्यु न हुई हो।’

महिला ने हामी भरी और वह सरसों के बीज की तलाश करती हुई एक घर से दूसरे घर भटकने लगी। हर घर में लोग उसे बीज देने के लिए तैयार हो जाते, किंतु वह जब पूछती कि उस घर में किसी की मृत्यु हुई है तो उसने पाया कि ऐसा कोई घर नहीं था, जहां कभी किसी की मृत्यु न हुई हो। कहीं पुत्री, कहीं सेवक, कहीं पति, तो कहीं पिता की मृत्यु हो चुकी थी। किसागोतमी को वहां एक भी घर ऐसा नहीं मिला, जहां कभी मृत्यु न हुई हो। यह देखकर कि वह अकेली इस दुख से पीड़ित नहीं थी, उसने अपने मृत पुत्र के शव का मोह छोड़ दिया और बुद्ध के पास लौट आई। तब बुद्ध ने अत्यंत करुण भाव से कहा, ‘तुमने सोचा कि सिर्फ तुम्हारे पुत्र की मृत्यु हुई है। मृत्यु का नियम यही है कि जीवित प्राणियों के बीच कोई भी शाश्वत नहीं है।’ किसागोतमी की तलाश ने उसे यह सिखाया कि कोई व्यक्ति दुख और पीड़ा से मुक्त नहीं है। इस भयंकर दुख से ग्रस्त होने वाली वह अकेली नहीं थी। इस बोध से अवश्यंभावी दुख तो समाप्त नहीं होता, किंतु जीवन के इस कटु सत्य से लड़ने के फलस्वरूप होनेवाला दुख अवश्य कम होता है।

कष्ट से सिर्फ अस्थायी तौर पर बचा जा सकता है। परंतु किसी ऐसी बीमारी की तरह जिसका इलाज न करवाया जाए (या ऊपरी तौर पर दवाओं से इलाज हो, जिससे उसके लक्षण तो दब जाएं किंतु असली रोग का निवारण न हो पाए), तो वह बीमारी बढ़ती जाती है। दवाओं आदि से कुछ देर के लिए आराम मिल सकता है लेकिन उनके लगातार प्रयोग से शरीर को होने वाले शारीरिक नुकसान तथा हमारे जीवन को होने वाले सामाजिक नुकसान के कारण उस असंतोष या भावनात्मक दर्द से कहीं अधिक पीड़ा हो सकती है, जिसके लिए हमने इन चीजों का शुरू में प्रयोग किया था। पीड़ा को अस्वीकार करना या उसे दबाना कुछ समय के लिए हमें उस दर्द को सहन करने से बचा सकती हैं, किंतु इससे हमारा कष्ट दूर नहीं होता।

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