
Chhath mata aarti: पढ़ें छठ मैया की आरती, जय छठी मैया ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से….
Chhath Maiya Aarti in Hindi: बिहार की लोक-परंपरा में सूर्य षष्ठी में छठी मैया की पूजा से संबद्ध अनेक गीत तथा लोक-कथाएं प्रचलित हैं। यहां पढ़ें छठ माता की आरती।
Chhath Mata Aarti: हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ पूजा का पर्व मनाया जाता है। छठ पूजा चार दिवसीय त्योहार है, जिसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। दूसरे दिन खरना पूजन किया जाता है। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं और चौथे दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण करते हैं। इस बार छठ पूजा 27 अक्तूबर, सोमवार को है। छठ व्रत में भगवान सूर्य व छठ माता की पूजा का विधान है। व्रती भगवान सूर्य को अर्घ्य देने के साथ छठ माता की विधि-विधान से आरती करते हैं। आप भी पढ़ें छठ माता की आरती यहां-
छठी मैया की आरती (Chhathi Maiya Ki Aarti)
जय छठी मैया ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।।
जय छठी मैया।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदिति होई ना सहाय।
ऊ जे नारियर जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।।
जय छठी मैया।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।।
जय छठी मैया।
अमरुदवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडरराए।।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।।
जय छठी मैया।
ऊ जे सुहनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
शरीफवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।।
जय छठी मैया
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।।
जय छठी मैया
ऊ जे सेववा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
जय छठी मैया।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।
सभे फलवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मंडराए।।
जय छठी मैया
मारबो रे सुगवा धनुख से, सुगा गिरे मुरझाए।
ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होई ना सहाय।।
जय छठी मैया।
छठ व्रत से जुड़ी कथाएं: छठ व्रत की उत्पत्ति के संबंध में जनश्रुतियों, लोक परंपराओं और पुराणों में कई कथाएं प्रचलित हैं। द्रौपदी, सुकन्या और नागकन्याओं द्वारा छठ व्रत करने की कथाएं प्रचलित हैं। भविष्योत्तर-पुराण के अनुसार जब पांडव जुआ में हारकर वनवास काल व्यतीत कर रहे थे। तब वे भाइयों के भरण-पोषण के लिए चिंतित थे। इसी बीच 80 हजार मुनि उनके आश्रम में पधारे। उनके भोजन की चिंता में युधिष्ठिर अधिक घबरा उठे। तब द्रौपदी अपने पुरोहित धौम्य ऋषि से इसका समाधान पूछने लगी। धौम्य ऋषि ने उन्हें भगवान सूर्य का व्रत रवि-षष्ठी करने का निर्देश दिया। इसे प्राचीन काल में भी नागकन्या के उपदेश से सुकन्या ने किया था। महाभारत में भगवान सूर्य द्वारा द्रौपदी को अक्षय-पात्र देने का जो आख्यान है, उसी से इसे जोड़ा गया है।





