Quote of the day: क्या हैं नरक के 3 द्वार? गीता के इस श्लोक में दिया गया है हिंट, त्यागने से सफल होगा मनुष्य जीवन
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कई ऐसी बातें बताई गई हैं, जिसे समझ लिया जाए तो मनुष्य जीवन सफल हो जाए। आज बात करेंगे 16वें अध्याय के 21वें श्लोक के बारे में जिसमें नरक के 3 द्वार के बारे में बताया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता हिंदू धर्म का सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि इसमें जिंदगी का वो सार छिपा हुआ है कि जिसे समझ लिया जाए तो सब आसान हो जाए। गीता में भगवान कृष्ण की बताई गई बातों को अगर सच में अपनी जिंदगी में उतार लिया जाए तो हम कई बातों को सोचकर अपना मन नहीं खराब करेंगे और हमें जिंदगी का असली उद्देश्य समझ आएगा। गीता के हर एक अध्याय और श्लोक में कुछ ऐसी बातें हैं जो इंसान को सही रास्ता दिखा सकती हैं। इन्हीं में से एक श्लोक हैं जोकि 16वें अध्याय में हैं। इस श्लोक के माध्यम से भगवान कृष्ण ने समझाया है कि नरक के तीन द्वार होते हैं। तो आइए इन तीनों द्वार के बारे में बारी-बारी से समझते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता के 16वें अध्याय का 21वें श्लोक में नरक के तीन द्वार के बारे में बताया गया है। ये तीन द्वारा काम, क्रोध और लोभ है। गीता के अनुसार ये तीनों चीजें धीरे-धीरे इंसान को गलत राह पर ले जाती हैं और उनकी जिंदगी को मुश्किल बनाती जाती हैं। काम, क्रोध और लोभ ये तीन ऐसी आदते हैं जो किसी भी इंसान को गलत रास्ते पर ले ही आती हैं। इस वजह से इंसान गलत फैसले लेने लगता है और संसार की चीजों में उलझता जाता है। जरूरत से ज्यादा इच्छाएं रखने की वजह से इंसान को हर एक छोटी बात पर गुस्सा आता है। इसके बाद मन में लालच की भावना आती हैं और ये चीजें उसे कभी शांत नहीं होने देती हैं। आइए इन तीनों के बारे में बारी-बारी से समझते हैं।
गीता का श्लोक
त्रिविधं नकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।
हिंदी में क्या है श्लोक का मतलब?
काम, क्रोध और लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं जो आत्मा का नाश करने वाले होते हैं। ऐसे में इन तीनों का त्याग करना ही उचित होता है।
नरक का पहला द्वार- काम
गीता के इस श्लोक के हिसाब काम का यही मतलब है कि इंसान की जरूरत से ज्यादा चाहत या इच्छाएं होना। जब इंसान को इस पर कंट्रोल नहीं हो पाता है तो कई बार वो सही और गलत का फर्क ठीक से नहीं कर पाता है। जरूरत से ज्यादा कुछ पाने की चाहत इंसान को बैचेन बनाती हैं। बेसिक चीज मिल जाने के बाद भी मन शांत नहीं रहता है क्योंकि कुछ ओर पाने की इच्छा कभी खत्म ही नहीं होची है। इस वजह से धीरे-धीरे तनाव की स्थिति बनने लगती है। एक जिंदगी में जितनी चीजें जरूरी हैं उनकी चाहत रखना गलत नहीं है लेकिन जरूरत से ज्यादा पा लेने वाली इच्छा किसी की भी शांति छीन सकती है।
नरक का दूसरा द्वार- क्रोध
गीता के इस श्लोक में नरक का दूसरा द्वार क्रोध यानी गुस्से को बताया गया है। दरअसल गुस्से में इंसान सही और गलत का फर्क कई बार नहीं समझ पाता है। या फिर स्थिति ऐसी बन जाती है कि गुस्से में इंसान जो भी करता है उस समय उसके दिमाग में ये चीज नहीं होती है कि इसका रिजल्ट क्या आएगा। ऐसे में कई बार वो अपने रिश्तों को भी खराब कर देता है। गुस्से में इंसान अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेता है। गीता में यही समझाया गया है कि जह किसी की इच्छा पूरी नहीं होती है तो उसे गुस्सा आने लगता है और आधी से ज्यादा चीजें यहीं से खराब होने लगती है। ऐसे में इसका त्याग कर देना ही सही होता है।
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नरक का तीसरा द्वार- लोभ
गीता के इस श्लोक के अनुसार जब किसी के मन में लालच बढ़ने लगता है तो मन कभी भी संतुष्ट नहीं रहता है। कुछ भी पा लेने के बाद भी लालच के चलते इंसान के मन में यही चीज रहती है कि अभी ओर चाहिए और ये कभी ना खत्म होने वाली इच्छा हो जाती है। जिस इंसान से संतोष कर लिया और हर एक चीज की कद्र करना सीख लिया तो अपने जिंदगी को बैलेंस्ड तरीके से गुजार सकता है।
गीता में इस श्लोक का वर्णन करते हुए आखिरी में यही बताया गया है कि ये चीजें नरक का द्वार हैं। इन्हें विष की तरह समझकर सही समय रहते त्याग कर देना चाहिए नहीं तो ये बर्बादी के ही रास्ते पर लेकर जाती हैं।
लेखक के बारे में
Garima Singhशॉर्ट बायो:
गरिमा सिंह एक अनुभवी डिजिटल पत्रकार हैं, जिन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव है। वर्तमान में वह लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में कार्यरत हैं। वह वास्तु, अंक शास्त्र, रत्न शास्त्र, फेंगशुई और राशिफल से जुड़े विषयों पर लिखती हैं।
परिचय और अनुभव
गरिमा सिंह डिजिटल मीडिया में लंबे समय से सक्रिय हैं। इस समय वह लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने अपने करियर में न्यूज, फीचर और एक्सप्लेनर कंटेंट पर काम किया है। अब वह ज्योतिष से जुड़े विषयों को सरल और व्यावहारिक तरीके से पाठकों तक पहुंचाती हैं। उनके आर्टिकल की खास बात ये है कि वह जटिल ज्योतिषीय बातों को आसान भाषा में समझाने की पूरी कोशिश करती हैं ताकि जिसे एस्ट्रोलॉजी का ए भी नहीं पता है वह भी आसान तरीके से चीजों को समझ सके और उस पर अमल कर सके।
करियर
गरिमा ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत रेडियो चैनल रेड एफएम से की। यहां पर उन्होंने रेडियो से जुड़ी बारिकियों को समझने की कोशिश की और मॉर्निंग शो को प्रोड्यूस करने के साथ-साथ कॉपी राइटिंग का भी काम संभाला। साथ में कई विज्ञापनों में वॉइस ओवर भी दिया। इसके अलावा उन्होंने डीडी न्यूज, जी न्यूज जैसे मीडिया संस्थानों में डिजिटल और टीवी पत्रकारिता को करीब से जाना और समझा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का यह अनुभव आज उनके डिजिटल राइटिंग और स्टोरीटेलिंग के तरीके को और भी प्रभावशाली बनाता है।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि
गरिमा ने साइकोलॉजी, इकोनॉमिक्स और इंग्लिश विषयों में बैचलर ऑफ आर्ट्स (B.A.) की डिग्री प्राप्त की है। इसके बाद उन्होंने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन दिल्ली और जामिया मिलिया इस्लामिया से टीवी और रेडियो पत्रकारिता की पढ़ाई की है। इस दौरान उन्होंने इंटर्नशिप भी की। वह जामिया मिलिया इस्लामिया की गोल्ड मेडलिस्ट भी रह चुकी हैं।
एस्ट्रोलॉजी लेखन की सोच
गरिमा का मानना है कि ज्योतिष का उद्देश्य डर पैदा करना नहीं, बल्कि लोगों को सही दिशा और सकारात्मक सोच देना होना चाहिए। उनका फोकस होता है- सरल जानकारी, संतुलित सलाह, भरोसेमंद और उपयोगी कंटेंट। वह शिव पुराण और कई और शास्त्रों की जटिल कथाओं को अपने शब्दों में लिखकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। गरिमा वास्तु शास्त्र और न्यूमरोलॉजी के अलावा फेंगशुई की किताबें पढ़ती रहती हैं और वहां की उपयोगी जानकारियों को पाठकों के साथ समय-समय पर साझा करती हैं।
व्यक्तिगत रुचियां
काम के अलावा गरिमा को गार्डनिंग, कुकिंग और टेबल टेनिस खेलना पसंद है। वह कानपुर से ताल्लुक रखती हैं और एक संतुलित जीवनशैली में विश्वास करती हैं।
विशेषज्ञता (Areas of Expertise)
वास्तु शास्त्र
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