
दिखावा करने से हर हाल में बचिए
अभिमान की भावना से मुक्त हुए बिना गुरु की सेवा करना प्रदर्शन मात्र है, भक्ति नहीं। ऐसी सेवा का परिणाम कल्याणकारी नहीं हो सकता। ‘मानस’ में ऐसी गुरुभक्ति का दृष्टांत लंकाधिपति रावण के रूप में हमारे सामने आता है।
अभिमान की भावना से मुक्त हुए बिना गुरु की सेवा करना प्रदर्शन मात्र है, भक्ति नहीं। ऐसी सेवा का परिणाम कल्याणकारी नहीं हो सकता। ‘मानस’ में ऐसी गुरुभक्ति का दृष्टांत लंकाधिपति रावण के रूप में हमारे सामने आता है। रावण भगवान शंकर का शिष्य है। उसने भगवान शंकर की स्तुति में ताण्डव स्तोत्र की रचना की है। इसमें जो कामनाएं प्रकट की गई हैं, वे बड़ी उदात्त हैं। रावण के विषय में यह वर्णन भी आता है कि भगवान शंकर की पूजा में उसने अपने सिर काटकर चढ़ा दिए थे। इसे पढ़-सुनकर कोई भी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो जाए, यह स्वाभाविक है, क्योंकि साधारणतया बिल्ब पत्र, दूर्वा एवं पुष्प आदि अर्पित कर भगवान शंकर की पूजा की जाती है। ‘मानस’ में रावण स्वयं इस घटना का बार-बार स्मरण दिलाता है। इसके पीछे रावण की गुरुभक्ति न होकर केवल यह दिखाने की चेष्टा है कि वह भगवान शंकर का कितना श्रेष्ठतम शिष्य है।
‘मानस’ में वर्णन आता है कि काकभुशुण्डि जी ने भी एक गुरु का वरण किया था। काकभुशुण्डि जी का जन्म अयोध्या में हुआ था। अकाल पड़ने पर वे उज्जैन आ गए। काकभुशुण्डि जी ऐसी दिव्य भूमि में आते हैं और दीक्षा लेते हैं। जिस गुरु से उन्होंने दीक्षा ली, उनके नाम का वर्णन कहीं नहीं किया गया है। ऐसा भी वर्णन कहीं पर नहीं मिलता कि वे बड़े महान थे, लेकिन रावण के गुरु भगवान शंकर तो श्रेष्ठतम गुरु हैं, त्रिभुवन गुरु हैं।
इस प्रकार एक ओर रावण त्रिभुवन गुरु का शिष्य है और दूसरी ओर काकभुशुण्डि जी एक ऐसे गुरु के शिष्य हैं, जिनका नाम तक ज्ञात नहीं है। कई लोग जब अपने गुरु का नाम बड़े गर्व से लेते हैं, तो केवल यह बताने के लिए कि ‘हम कितने महान हैं कि ऐसे गुरु के शिष्य हैं।’ वस्तुतः इसके द्वारा वे अपनी महिमा का ही विज्ञापन करना चाहते हैं।
गुरु का नाम कितना बड़ा है, उनकी कितनी प्रसिद्धि है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। अनाम गुरु से भी व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। अपनी महत्ता के प्रदर्शन के लिए विख्यात नामधारी गुरु की खोज करना या वरण करना अकल्याणकारी हो सकता है। शिष्य स्वयं को छोटा माने, तभी कल्याण होगा और कहीं दोनों महान हो गए, तो झगड़ा हो जाएगा।





