
Amla navami Katha in Hindi: आंवला नवमी पर आंवले के पड़े के नीचे बैठकर सुने यह कहानी
Amla navami katha kahani in hindi:आंवला भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है, इसलिए भगवान के प्रिय मास कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए भोजन बनाना चाहिए
आंवला भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है, इसलिए भगवान के प्रिय मास कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। इस दिन आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करनी चाहिए भोजन बनाना चाहिए, ब्राह्मणों को भोजन करना चाहिए और खुद भी भोजन करना चाहिए। इस दिन इस कथा को भी आंवले के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ना चाहिए।-प्राचीन काल की बात है, कावेरी नदी के पास देवशर्मा नाम से एक ब्राह्मण रहते थे, जो वेदों को पढ़ते थे और इसमें विद्वान् थे। उनके एक पुत्र था, जो व्यवहार से खराब आचरण वाला था । एक दिन पिता यानी देवशर्मा ने उसे कहा कि बेटा! इस समय कार्तिकका महीना चल रहा है जो भगवान् विष्णु को बहुत ही प्रिय है । तुम कार्तिक मास में स्नान करो, दान को और श्री हरि के लिए व्रत करो। तुलसी के फूलसहित भगवान् विष्णु की पूजा करो। तुलसी पर दीपदान करो। भगवान के लिए दीप-दान, नमस्कार करों और फिर प्रदक्षिणा करो। पिताको यह बात सुनकर पुत्र को बहुत गुस्सा आ गया। उसने पिता जी को अपशब्द कहे और बोला -मैं कार्तिक में पुण्य-संग्रह नहीं करूंगा। पुत्रका यह वचन सुनकर विद्वान को को क्रोध आया और उन्होंने कहा-दुर्बुद्धि! तू वृक्ष के खोखले में चूहा हो जा।'इस श्राप के भय से डरे हए पुत्र ने पिता को नमस्कार करके पूछा कि पिताजी मेरा अपराध क्षमा करें और इस योनि से मुक्ति का उपाय बताएं।

इस प्रकार पुत्र के विनती करने पर ब्राह्यण ने श्राप का कारण बताया-जब तुम भगवान को प्रिय लगने वाले कार्तिक व्रत का माहात्म्य सुनोगे, उस समय उस कथा के सुनने मात्र से तुम्हारी मुक्ति हो जाएगी। पिता के ऐसा कहने पर वह उसी चूहा हो गया ओर कई साल तक वनों में धूमता रहा। एक दिन कार्तिक मास में विश्वामित्रजी अपने शिष्यो के साथ वहां आए। वो भगवान की पूजा के लिए आंवले की छाया में बैठे। उन्होने अपने शिष्यो को कार्तिक मास का माहात्म्य सुनाया। उसी समय कोई एक शिकारी वहां आया, उसने ऋषियों को डराया और मारने की धमकी दी। लेकिन महात्मा के दर्शन मात्र से उसकी बुद्धि ठीक हो गई। उसने ब्राह्मणों को नमस्कार करके कहा-आपलोग यहां क्या कर रहे हैं, मेरी जानने के इच्छा है ? उसके पूछने पर विश्वामित्र बोले-कार्तिक मास सब महीनों श्रेष्ठ बताया जाता है। उसमे जो कर्म किया जाता है, वह बरगद के बीज की तरह बढता हे। व्याध को प्रेरणा से विश्वामित्रजी के कहे हुए इस धर्म को सुनकर वह शिवशर्मा के बेटे ब्राह्मण कुमार का श्राप भी मुक्त हुआ और वो चूहे का शरीर छोड़कर तत्काल दिव्य देह से युक्त हो गया। इस प्रकार वो विश्वामित्र को प्रणाम करके स्वर्गको चला गया। शिकारी भी तब से कार्तिक मास के नियमों का पालन करने लगा।
आंवला नवमी का माता लक्ष्मी से है संबंध
आंवला नवमी से जुड़ी माता लक्ष्मी की भी कथा है। एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। रास्ते में उनकी इच्छा हुई कि वो भगवान विष्णु एवं शिव की पूजा एकसाथ करें। वो विचार करने लगीं कि किस तरह विष्णु और शिव की पूजा कैसे की जा सकती है। तभी उन्होंने सोचा तुलसी और बेल के गुण एक साथ आंवले में पाया जाता है। तुलसी श्री हरि विष्णु को अत्यंत प्रिय है और बेल भगवान भोलेनाथ को,इसलिए उन्होंने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक चिह्न मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष की पूजा की, उस दिन कार्तिक मास की नवमी तिथि थी। तभी से नवमी तिथि थी और उसी दिन से इसे आंवला नवमी कहा गया। मां लक्ष्मी की पूजा से प्रसन्न होकर श्री विष्णु और शिव प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर विष्णु और भगवान शिव को भोजन कराया। इसके बाद स्वयं ने भोजन किया। तभी से आंवला वृक्ष पूजन की यह परम्परा चली आ रही है।





