Amalaki Ekadashi Vrat Katha :आमलकी एकादशी व्रत कथा के बिना अधूरा है व्रत, पद्मपुराण में है इस एकादशी का जिक्र
amalaki ekadashi 2026 vrat katha in hindi :फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी आज है, इसे आमलकी एकादशी कहते है। ऐसा कहा जाता है, जो इस एकादशी का व्रत करता है, वो विष्णुलोक को जाता है। इसका उल्लेख पद्मपुराण में किया गया है।

भगवान् श्रीकृष्ण ने पद्मपुराण में एकादशी व्रत का महत्व बताया है। उन्होंने बताया कि अब मैं आपको उस एकादशी के बारे में बताता हूं, जिसे राजा मान्धाता के पूछने पर महात्मा वसिष्ठ ने कहा था। फाल्गुन शुक्ल पक्षकी एकादशी का नाम आमलकी एकादशी है। ऐसा कहा जाता है, जो इस एकादशी का व्रत करता है, वो विष्णुलोक को जाता है। त्रेतायुग में एक बार राजा मांधाता ने ऋृषि वशिष्ट जी से अनुरोध किया कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कोई ऐसा व्रत बताएं, जिससे मेरा हर प्रकार से कल्याण हो। उन्होंने कहा, वैसे तो सभी व्रत उत्तम है, लेकिन सबसे उत्तम है। इस व्रत को करने से सभी पापों का नाश होता है। इस व्रत को करने से एक हजार गायों के दान के बराबर फल मिलता है। यहां पढ़ें इस व्रत की कथा-
महात्मा वसिष्ठ ने पहले बताया आमलकी वृक्ष का महत्व
बताया कि आमलकी महान् वृक्ष है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। उन्होंने बताया कि सर्वश्रेष्ठ आमलकी का वृक्ष भगवान विष्णु जी को प्रिय है। इसके स्मरणमात्र से गोदान का फल मिलता है। स्पर्श करने से इससे दूना ओर फल भक्षण करने से तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए आमलकीका सेवन करना चाहिए । इस पेड़ के मूल में विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, स्कन्ध में परमेश्वर भगवान् रुद्र, शाखाओं में मुनि, टहनियों में देवता वास करते हैं। इस एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष के पास जाकर रात्रि में जागरण करना चाहिए। इससे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता।
भगवान विष्णु ने कहा- द्विजवरो, इस व्रत की उत्तम विधि में बताता हूं। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नानादि करने के बाद यह संकल्प करें की 'हे पुण्डरीकाक्ष, हे अच्युत मैं एकादशी को निराहार रहकर दूसरे दिन भोजन ग्रहण करूंगा। आप मुझे अपनी शरण में रखिए। इसके बाद पतित, पाखंडी, दुराचारी, चोर, मर्यादा भंग करने वाले और गुरुपलीगामी लोगों से वार्तालाप न करें। अपने मन पर संयम रखें और नदी में, कुएं पर, पोखरे में और अगर संभव न हो तो घर में ही स्नान करें। स्नान करने से पहले शरीर में मिट्टी लगाएं।
मृत्तिका लगानेका मंत्र
अश्रक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे,
मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम्।
स्नान का मंत्र
त्वं मातः सर्वभूतानां जीवन तत्तु रक्षकम्, स्वेदजोद्धिज्जातीनां, रसानां पतये नमः।
स्नातो5ह॑ सर्वतीर्थेषु हृदप्रस्तवणेषु च, नदीषु देवखातेषु इदं रत्रान॑ तु मे भवेत्।
भगवान परशुराम की भी होती है पूजा
इस दिन भगवान परशुराम की प्रतिमा लें, धन के अनुसार एक या आधे माशे सुवर्ण की होनी चाहिए। इसको घर लेकर आएं और स्नान के पश्चात् पूजा और हवन करें। इसके बाद सब प्रकार की सामग्री लेकर आंवले के वृक्षके पास जाएं, वहां वृक्ष के चारों ओर की जमीन झाड़-बुहार, लीप-पोतकर शुद्ध करें। शुद्ध की हुई भूमि में मन्त्र पाठपूर्वक जल से भरे हुए कलश की स्थापना करें। कलश में पंच पल्लव ओर दिव्य गन्ध आदि छोड़ दें। इसके बाद चन्दन से उसको सजाएं। कण्ठ में फूल की माला पहनाएं। सब प्रकार के धूप की सुगन्ध फैलाएं। जलते हुए दीपकों की श्रेणी सजाकर रखें। पूजा के लिए नया छाता, जूता और वस्त्र भी मंगाकर रखें। कलश के ऊपर एक पात्र रखकर उसे दिव्य लाजों (खीलों) से भर दें। परशुरामजी , आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आंवले के फलके साथ दिया हुआ मेरा यह अर्घ्य ग्रहण कीजिए।
रात्रि जागरण भक्तियुक्त चित्त से जागरण करें। नृत्य, संगीत, वाद्य, धार्मिक उपाख्यान तथा श्रीविष्णुसम्बन्धिनी कथा-वार्ता आदिके द्वारा वह रात्रि व्यतीत करें। उसके बाद भगवान् विष्णुके नाम ले-लेकर आमलकी वृक्ष की परिक्रमा एक सो 8 या 28 बार करें। फिर सबेरा होनेपर श्रीहरिकी आरती करे। ब्राह्मणकी पूजा करके वहां की सब सामग्री उसे निवेदन कर दे | परशुरामजी का कलश, दो वस्त्र, जूता आदि सभी वस्तुएं दान कर दे ओर यह प्रार्थना करें कि परशुरामजीके स्वरूप में भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। तत्पश्चात् आमलकी का स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करे और स्रान करनेके बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको भोजन कराएं। -पद्मपुराण में वर्णित
यहां पढ़ें इस व्रत की कथा-
वैदिक नाम के एक नगर में एक ब्राह्राण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र चारों का परिवार अच्छे से रहता था। वहां पर सदैव वैद ध्वनि गूंजत थी। उस नगर में चैत्ररथ नाम का चंद्रवंश राजा था। नगर के सभी लोग भगवान विष्णु के परम भक्त थे और भगवान विष्णु के लिए एकादशी व्रत किया करते थे। हर साल की तरह इस आमसाल भी आमलकी एकादशी आई। सभी ने आनंदपूर्वक एकादशी का व्रत किया। राजा प्रजा के साथ मंदिर में आंवले की पूजा सभी नैवेद्यों आदि से किया। मंदिर में सभी ने रात्रि जागरण किया। उस दिन वहां एक दुराचारी और पापी बहेलिया आया। वह जीव हत्या करके अपना घर चलाता था, एक दिन उसे कोई शिकार नहीं मिला। इसलिए उस दिन वह वहां भूखा रहा। भूख के कारण एक मंदिर में चला गया और एकादश व्रत का महात्मय सुनने लगा। रात में उसने कुछ नहीं खाया और घर जाकर भोजन किया। अनजाने में उससे एकादशी का व्रत हो गया। कुछ टाइम बाद उसकी मृत्यु हो गई। एकादशी व्रत के प्रभाव से अगले जन्म में वह राजा विधुरथ के यहां जन्मा। उसका नाम वसुरथ रखा गया। वह सेना के साथ 10 हजार ग्रामों का पालन करने लगा। वह तेज में सूर्य के तरह और कांति में चंद्रमा की तरह था। वह विष्नु भक्त था और दान करना और यज्ञ करना उसका काम था।
आमलकी एकादशी के व्रत के प्रभाव
एक दिन राजा वसुरथ शिकार खेलने गया और रास्ता भटक गया। तभी राजा को आवाज आई कि कुछ मलेच्छ उसे मारने आ रहे हैं, उनका कहना था कि राजा ने उन्हें राज्य से बाहर निकवाया है और अब वो राजा को नहीं छोड़ेगें। इस पर वो अस्त्र लेकर राजा को मारने दौड़े। लेकिन राजा पर उनके अस्त्रों का कोई प्रभाव नहीं हुआ और राजा के शरीर से एक देवी उत्पन्न हुईं और उन्होंने सभी मलेच्छ को मार दिया। इस प्रकार भविष्यवाणी हुई तुम्हारी रक्षा स्वयं भगवान विष्णु ने की है। इस प्रकार उसकी एक दिन क आमलकी एकादशी के व्रत के प्रभाव से सब अच्छा हो गया। जो आमलकी एकादशी का व्रत करते हैं, उनके सभी कार्य पूर्ण होते हैं और ऐसा व्यक्ति अंत में मोक्ष प्राप्त करता है।
लेखक के बारे में
Anuradha Pandeyशार्ट बायो
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