अधिकमास के नौवें और 10वें अध्याय की कथा पढ़ें, कैसे एक कन्या ने अधिकमास का अपमान कर दुख पाया

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Adhik maas katha in hindi:नवां अध्याय की कथा- सूत जी कहने लगे कि इसके बाद नारद जी ने मेधावी ऋषि की कन्या का वृतान्त पूछा। नारद जी ने पूछा-हे प्रभो! फिर उस ऋषि कन्या ने वन में क्या किया, क्‍या किसी ऋषि ने उसके साथ,वित्वाह किया। तब नारायण ने कहा कि

अधिकमास के नौवें और 10वें अध्याय की कथा पढ़ें, कैसे एक कन्या ने अधिकमास का अपमान कर दुख पाया

अधिकमास की कथा का हम यहां नवां अध्याय और दसवां अध्याय दे रहे हैं। आप यहां से इसकी कथा पढ़ सकते हैं। नवां अध्याय की कथा- सूत जी कहने लगे कि इसके बाद नारद जी ने मेधावी ऋषि की कन्या का वृतान्त पूछा। नारद जी ने पूछा-हे प्रभो! फिर उस ऋषि कन्या ने वन में क्या किया, क्‍या किसी ऋषि ने उसके साथ,वित्वाह किया। तब नारायण ने कहा कि उस कन्या ने दुःख के साथ अपने पिता का स्मरण करते हुए वहां आश्रम में रहकर कुछ काल व्यतीत किया। भाग्यवश एक दिन उस वन में अचानक महाकोप वाले दुर्वासा मुनि आ गए। आश्रम में मुनि को आता हुआ देखकर शोक सागर में डूबी हुई उस कुमारी ने मुनि के चरणों में नमस्कार किया। नमस्कार करके मुनि को अपने आश्रम में लाई। अर्ध्य, पाद्य और वन के नाना प्रकार के फलों से आदर करके मुनि का पूजन किया। फिर मुनि कन्या आदर से कहने लंगी-हे मुने! आप को नमस्कार है। मुझ दुर्भागिनी के आश्रम में आपका कैसे आना हुआ? आपके आने से मेरे भाग्य का उदय हो गया। अपने पिता का स्मरण करते हुए वहां आश्रम में रहकर कुछ काल व्यतीत किया। कन्या ने पूछा कि मेरे पिता के पुण्य प्रताप से; मुझको समझाने के लिए आप आए हैं। आप जैसे महात्माओ के तीर्थरूपी पांवों के रजकण को स्पर्श कर मेरा जन्म ही सफल हो गया जो आप जैसे महात्माओं का मुझको दर्शन हुआ। इस प्रकार कहकर यह बाला उनके आगे चुपचाप होकर बैठ गई, तब दुर्वासा मुनि कुछ हंसकर बोले-धन्य धन्य हे ब्राह्मण पुत्री- तुमने अपने पिता के कुल का उद्धार कर दिया है। कन्या बोली-हे मुनि! आपके वचनों को सुनकर मेरा दुःख दूर हो गया । हे मुने! आप कृपा कर ऐसा उपाय बताएं. जिससे मेरा दुःख दूर हो मै दुःख शोक में अग्नि की ज्वाला में जल रही हूं , मुझको सहारा देने वाली न तो मेरी माता है, न पिता, न पाई । मैं दुःख पीड़ित किस प्रकार जीवन नर्वाह करुं? जिस दिशा को देखती हूं. हीं अन्धकार दिखाई देता है। श्री नारायण कहने लगे-हे नारद! इस प्रकार कन्या के वचनों को सुनकर मुनि दुर्बासा ने इस बाला को देखकर कुछ हितकारक वचन बोले।

10वां अध्याय

ऋषि कहने लगे-हे सुन्दरी! अब से तीसरा मास पुरुषोत्तम आएगा, उसमें स्नान करने से मनुष्य दोषों से छूट जात है। इसके तुल्य कार्तिकादि कोई भी मार नहीं है। सब मास तथा पक्ष और भी पुरुषोत्तम मास की सोलहवं कला के बराबर भी नहीं है। बारह हजार वर्ष गंगा में स्नान करने से जो फल मिलता है और सिंह के बृहस्पति ग गोदावरी गंगा में स्नान करने से जो फर मिलता है, वही फल कहीं भी पुरुषोत्तम मास में एक बार स्नान करने से प्राप्त हे जाता है। यह श्रीकृष्ण का प्रिय मास है, इसमें स्नान, दान, जपादि करने से सब मनोवांछित फलों की प्राप्ति होत है इसलिए तुम भी पुरुषोत्तम मास क॑ सेवा करो।

मुनिराज कन्या को ऐसे वचन कहक' चुप हो गये। श्रीकृष्ण ने कहा कि मुनि के वचन सुनकर, भावों से प्रेरित होकर वह मूढ़ बाला क्रोधित होकर _बोली-हे ब्राह्मान्‌! मुझको आपके वचन ठीक नहीं लगे। माघादि मास किस प्रकार थोड़ा फल देने वाले हैं और कार्तिकादि मास को कैसे कम कहते हो? क्या सेवा किया हुआ वैशाख मास इच्छित फल नहीं देता? यह तो मलमास सब कर्मो में निंदित है। हे मुने! सूर्य संक्रांति से रहित मलमास को आप कैसे श्रेष्ठ कह सकते हैं? इस प्रकार क्रोध से | कहे गये ब्राह्मण की पुत्री के वचनों को सुनकर, ऋषि का शरीर जलने लगा और क्रोध से नेत्र लाल हो गए। परन्तु फिर भीं मित्र की कन्या को श्राप नहीं दिया और सोचने लगे कि कन्या मूर्ख हैं, अपने हित अहित को नहीं जानती पुरुषोत्त का महात्म्य जो बड़े-बड़े ज्ञानी भी नहीं जानते तो कम बुद्धि वाले पुरुष और कन्या कैसे जान सकती हैं और यह बिना पिता की कन्या, दुःख रूपी अग्नि से सुलगती हुई, मेरे अत्यन्त उग्र श्राप को कैसे सहन कर सकेगी। ऐसे उत्पन्न हुए क्रोध को दूर करते हुए और स्वस्थ होकर व्याकुल कन्या से कहने लगे-तू दुःखी और नादान है, इसलिए तेरे पर मेरा कुछ भी कोप नहीं, जैसा तेरे निर्भाग्य मन में हो वैसा ही कर और भी जो कुछ होने वाला है सो सुन। मैं कहता हू, तूने जो पुरुषोत्तम मास का अनादर किया है, इसका फल इस जन्म या अगले जन्म में अवश्य होना चाहिए। क्योंकि तेरा पिता मेरा मित्र था इसलिये तुझको श्राप नहीं देता हूं कि तू बालक है और अपने शुभ तथा अशुभ को नहीं पहचानती। तेरा कल्याण हो, मैं तो नारायण की सेवा में जाता हूं । श्रीकृष्ण कहने लगे कि ऐसा कहकर वह महाक्रोधी तपस्वी मुनि झटपट चले गये और उसी क्षण वह कन्या पुरुषोत्तम के प्रभाव से कान्तिहीन हो गई और अपने मन में विचार करने लगी कि तत्काल फल देने वाले पार्वती पति श्री शंकर की आराधना करूंगी। ऐसा निश्चय करके अपने आश्रम में जाकर वह कठिन तप करने की इच्छा करने लगी। सूत जी कहने लगे-वह बाला प्रबल मुनि के वचनों को निंदित कर तथा बहुत फल वाले विष्णु और सावित्री पति ब्रह्मा को छोड़कर अपने वन आश्रम में केवल शंकर भगवान की सेवा करने लगी।

Anuradha Pandey

लेखक के बारे में

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शार्ट बायो

अनुराधा पांडेय पिछले 16 सालों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं और वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में एस्ट्रोलॉजी और करियर टीम का नेतृत्व कर रही हैं।


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अनुराधा पांडे पत्रकारिता जगत का एक अनुभवी चेहरा हैं, जिन्हें मीडिया में 16 वर्षों का व्यापक अनुभव है। वर्तमान में वह 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में असिस्टेंट एडिटर के पद पर कार्यरत हैं और संस्थान के एस्ट्रोलॉजी और करियर सेक्शन की इंचार्ज हैं। अनुराधा पिछले 10 सालों से लाइव हिन्दुस्तान के एस्ट्रोलॉजी सेक्शन में लिख रही हैं। डिजिटल पत्रकारिता के दौर में उन्होंने धर्म जैसे महत्वपूर्ण विषय पर अपनी लेखनी से करोड़ों पाठकों का भरोसा जीता है। उनके पास खबरों को न केवल प्रस्तुत करने, बल्कि सरल जानकारी, संतुलित सलाह, भरोसेमंद और विश्लेषणात्मक कंटेंट देने का लंबा अनुभव है। वह शिव महापुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और कई अन्य शास्त्रों के जटिल तथ्यों को अपने शब्दों में लिखकर पाठकों तक पहुंचाती हैं।


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