5,000 साल से भी ज्यादा पुरानी है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा, जानिए कैसे हुई इस दिव्य परंपरा की शुरुआत
5,000 साल से भी ज्यादा पुरानी है भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा। जानिए राजा इंद्रद्युम की कथा, विश्वकर्मा और अधूरी मूर्तियों की कहानी। पुरी रथ यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और इस दिव्य परंपरा का महत्व क्या है, विस्तार से पढ़ें।

भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि हजारों वर्ष पुरानी आस्था और परंपरा का जीवंत प्रतीक है। हर साल लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचकर तीनों देवताओं - जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के विशाल रथों को खींचते हैं। यह यात्रा सिर्फ पुरी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में भक्ति की अनुपम मिसाल बनी हुई है। इस साल महाप्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू होगी और 24 जुलाई तक विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न होगी।
रथ यात्रा की प्राचीनता
भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा की शुरुआत लगभग 5,000 साल पहले मानी जाती है। यह परंपरा कलियुग के आरंभिक काल से चली आ रही है। स्कंद पुराण के उत्कल खंड में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। मान्यता है कि यह यात्रा भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से शुरू हुई थी, जब वे अपनी बहन सुभद्रा के साथ द्वारिका से पुरी आए थे।
राजा इंद्रद्युम की भक्ति
मालव देश के राजा इंद्रद्युम भगवान जगन्नाथ के परम भक्त थे। एक बार वे नीलांचल पर्वत पर गए, लेकिन उन्हें भगवान के दर्शन नहीं हुए। निराश होकर लौटते समय उन्हें आकाशवाणी हुई कि भगवान जल्द ही धरती पर प्रकट होंगे। इस घटना के बाद राजा इंद्रद्युम ने भगवान की मूर्ति बनाने का संकल्प लिया।
समुद्र से आई दिव्य लकड़ी
एक दिन राजा इंद्रद्युम पुरी के समुद्र तट पर टहल रहे थे। अचानक उन्हें समुद्र में दो विशाल लकड़ी के टुकड़े तैरते दिखाई दिए। आकाशवाणी याद आते ही उन्होंने समझ लिया कि यही लकड़ी भगवान की मूर्ति बनाने के लिए है। उन्होंने इन लकड़ियों को किनारे पर लाने का आदेश दिया।
विश्वकर्मा का दिव्य रूप
भगवान की आज्ञा से देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा बढ़ई के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने राजा से शर्त रखी कि वे मूर्ति एकांत में बनाएंगे और कोई बीच में नहीं आएगा। राजा ने शर्त मान ली। विश्वकर्मा ने गुण्डिचा मंदिर के पास मूर्ति बनाने का काम शुरू किया।
अधूरी मूर्तियों का राज
कुछ दिनों बाद राजा इंद्रद्युम अधीर हो गए और बिना अनुमति के कार्यशाला में चले गए। उन्हें देखते ही विश्वकर्मा वहां से अंतर्ध्यान हो गए। मूर्तियां अधूरी रह गईं। तब आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी अधूरे रूप में पूजे जाना चाहते हैं। राजा इंद्रद्युम ने विशाल मंदिर बनवाकर इन तीनों अधूरी मूर्तियों को स्थापित किया।
रथ यात्रा की शुरुआत
भगवान जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम को आदेश दिया कि वे साल में एक बार अपनी जन्मभूमि जरूर जाएंगे। इसी आदेश के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को रथ यात्रा निकालने की परंपरा शुरू हुई। तब से आज तक यह दिव्य परंपरा बिना रुके चली आ रही है।
रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक एकता का जीवंत रूप है। यह परंपरा हजारों साल से चली आ रही है और आज भी लाखों भक्तों को आकर्षित करती है।


